अध्याय तीन
( ३)
भावरा
ग्राम-धरा
मंजरित इस आम्र-तरु की छाँह में बैठो पथिक ! तुम,
मैं समीरण से कहूँ, वह अतिथि पर पंखा झलेगा।
गाँव के मेहमान की अभ्यर्थना है धर्म सबका,
वह हमारे पाहुने की भावनाओं में ढलेगा।
नागरिक सुकुमार सुविधाएँ, सुखद अनुभूतियाँ बहु,
दे कहाँ से तुम्हें सूखी पत्तियों का यह बिछावन।
आत्मा की छाँह की, पर तुम्हें शीतलता मिलेगी,
ग्राम-अन्तर की मिलेगी भावना पावन-सुहावन।
और परिचय मैं बता दूँ, भावरा कहते मुझे सब,
जो घुमड़ती ही रहे, उस याद जैसा गाँव हूँ मैं।
छोड़ जाता जो समय के वक्ष पर दृढ़-चिह्न अपना,
अंगदी व्यक्तित्व का अनगढ़ हठीला पाँव हूँ मैं।
सभ्यता की वर्ण-माला की लिखी पहली लिखावट,
सुभग मंगल तिलक-सा हूँ, संस्कृति के भाल पर मैं।
हो रहा संकैंच, कैसे मैं बखानूँ रूप अपना,
एक तिल जैसा हुआ प्रस्थित प्रकृति के गाल पर मैं।
गिरि-शिखरियों के सुहावन सुखद आँगन में अवस्थित,
छू रही नभ कैं हठीली विंध्य-पर्वत की भुजाएँ।
लग रहा, जैसे प्रकृति के पालने में झूलता मैं,
गगन के छत से बँधी ये डोरियाँ गिरि-मेखलाएँ।
या कि माँ की गोद में, मैं दुबक कर बैठा हुआ-सा,
माँगती मेरे लिए वह, हाथ ऊँचे कर दुआएँ।
या पिलाने दूध, आँचल ओट माँ ने कर लिया हो,
ले बलैंया, टालती हो वह सभी मेरी बलाएँ।
या कि नटखट एक बालक ओट लेकर छिप गया हो,
माँ प्रकट हो, उछल औचक हूप! कर उसकैं डराने।
चौंकती-सी देख उसकैं, डर गई! कहकर चिढ़ाने,
डाल गलबहियाँ, विजय के गर्व से फिर खिलखिलाने।
और अब इस ओर देखो, ताल यह जल से भरा जो,
चमकता ऐसे, चमकता जिस तरह श्रम का पसीना।
या कि पर्वत-शृंखला की प्रिय अँगूठी में जड़ा हो,
जगमगाता शुभ्र शुभ अनमोल सुन्दर-सा नगीना।
या कि वृत्ताकार दर्पण, हो खचित वर्तुल परिधि में,
शैल-मालाएँ सँवर कर रूप इसमें झाँकती हों।
स्वच्छ, जैसे दूधिया चादर बिछाई हो किसी ने,
फूल-पुरइन, उँगलियाँ जैसे सितारे टाँकती हों।
देखते हो तुम पथिक! तरु वृन्द अपने पास ही जो,
ये सुकृत जैसे, समय अनुकूल फलते-फूलते हैं।
झूमने लगते कभी फल-भार के उन्माद से ये,
चढ़ समीरण के हिंडोले पर कभी ये झूलते हैं।
रात है इन पर उतरती, साधना की शान्ति जैसी,
और उजले दिन कि जैसे तेज हो तप का विखरता।
शान्ति मन में, पर यहाँ संघर्ष जीवन में निरन्तर,
कर्म की आराधना से, मन यहाँ सब का निखरता।
ग्राम-वासी लोग, जैसे साधना-रत कर्मयोगी,
सन्त जैसे सरल मन, अवधूत जैसे आदिवासी।
पुण्य के प्रति नित विचारों में प्रगति मिलती यहाँ पर,
और मिलती पाप के प्रति यहाँ जीवन में उदासी।
ग्राम-घर, ऊँचे भवन कुछ, संकुचित-सी कुछ झुपड़िएँ,
बहुरिएँ, ज्यों ससुर जी को देखकर शरमा गईं हों।
कुछ अटरिएँ धवल, शोभित हैं घरौदों में कि जैसे,
बाल-मुख में दूध की कुछ-कुछ दँतुलिएँ आ गई हों।
और अब अनमोल निधि अपनी दिखाऊँ पथिक तुमको,
सिंह जैसी खोह-सी यह झोंपड़ी जो दिख रही है।
यह प्रगति के पत्र पर अपनी अगति की लेखनी से,
गर्व की लिपि में विगत गौरव कथाएँ लिख रही है।
एक दिन था जब कि इसकी कोख की पीड़ा फली थी,
एक दिन आया कि सोया भाग्य जब इसका जगा था।
एक ऐसा दिन सुनहला आ गया इस झोंपड़ी में,
चन्द्रशेखर नाम से जब शौर्य का सूरज उगा था।
मिल गई थी ज्येति घर को, लाल गुदड़ी को मिला था,
उल्लसित ममतामयी माँ को मिला था शिशु सलोना।
वंश को दीपक, पिता को सिंह-शावक मिल गया था,
गाँव वालों को मिला था खेलता-हँसता खिलौना।
सरल शैशव को मिले जब बालपन के चपल पग, तो,
गाँव घर था, और क्रीड़ागार थे मैदान जंगल।
वह प्रकृति की पाठशाला में खुला भू-ज्ञान पढ़ता,
साथियों के साथ वन में वह मनाता मोद-मंगल।
हो गए गिरि-शृंग बौने, हौसले ऊँचे हुए थे,
जब हुआ मन, चन्द्रशेखर जंगलों को छानता था।
नापता रहता विटप बट, आम्र, पीपल, ताड़ के वह,
शैल का हर शिखर झुकता और लोहा मानता था।
भील-बालक, बाल-सेना के सभी सैनिक सुभट थे,
जंगलों में तीर-कमठे ले सभी निर्भय विचरते।
साधते सच्चे निशाने, होड़ आपस में लगाकर,
हिंस्र-पशु इस सैन्य-दल की गंध पाकर ही सिहरते।
एक दिन बालक अहेरी भटक कर जा दूर निकले,
अगम पर्वत की ढलानों पर जमा जंगल घना था।
एक झाड़ी से उछल कर गुरगुराता सिंह निकला,
होश सबके उड़ गए, यह मौत से ही सामना था।
चढ़ गए झट तीर, कमठों पर स्वयं अभ्यस्त गति से,
घूरती उस मौत से आँखें सभी की मिल रही थीं।
साँस रोके ये खड़े सन्नद्ध अपने मोर्चे पर,
धड़कनें गतिवान थीं, पलकें न पल को हिल रही थीं।
सिंह वह विकराल-भीषण काल, सम्मुख ही अड़ा था,
सजगता से धड़कनों की चपल आहट ले रहा था।
खोजता था वह बहाना, झपटने आखेटकों पर,
रोष के आवेश में वह पूँछ में बल दे रहा था।
किन्तु यह क्या, एक प्रस्तर प्रस्खलित हो लड़खड़ाया,
सिंह ने हमला समझ, विकराल एक छलाँग मारी।
सामने से वाण-वर्षा हो गई घनघोर गति से,
सिंह के आवेश की आखेटकों ने लू उतारी।
किन्तु मरता क्या न करता, तड़प घायल सिंह उछला,
जान की बाजी लगा कर, जान थी उसने बचाई।
भावना के बोझ से दब, शब्द बाहर आ न पाए,
दे रहे थे नयन सबके मूक भाषा में बधाई।
एक कोने से उछल कर आ गया प्रस्ताव झट से,
दीर्घ-जीवी मित्र हो, माँगें सभी प्रभु से दुआएँ।
हो न यदि आपत्ति ब्राह्मण-देवता को तो सभी मिल,
सिंह का आमिष बना, सहभोज कर खुशियाँ मनाएँ।
चन्द्रशेखर की परीक्षा थी, खरा उत्तर दिया यह,
मानता, कुल-धर्म आमिष-भोज की अनुमति न देता।
साथियों का साथ देना, एक यह भी धर्म मेरा,
है नहीं मानव, समय ही धर्म का होता प्रणेता।
एक पल की देर होती, सिंह हमको फाड़ खाता,
मान्य है प्रस्ताव अपने शत्रु को हम फाड़ खाएँ।
प्यास मानव-रक्त से अपनी बुझाने जो चला था,
कर उसे उदरस्थ हम भी भूख अब अपनी मिटाएँ।
हम समय की माँग को पूरा करेंगे साथ देकर,
हम निरीहों पर सदय हो, सतत संरक्षण करेंगे।
जो हमारी जान का ग्राहक बने, कैसे बचेगा,
हम न छोड़ेंगे उसे संहार कर, भक्षण करेंगे।
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