आजाद महाकाव्य- 12, 13, 14
चन्द्रशेखर आजाद महाकाव्य
-श्रीकृष्ण सरल
सर्ग- 12. 13. 14
[12]
वर की खोज
आजाद, गोद में मेरी ऐसे आ बैठा,
सचमुच ही जैसे मैंने उसको गोद लिया।
उसके प्रति इतना स्वाभाविक आकर्षण था,
जैसे हठमठ ही उसने मेरा दूध पिया।
अंग्रेजी शासन के मुँह पर थप्पड़ जड़कर,
मेरी गोदी में आ बैठा निर्भीक-मना।
जैसे घर में ऊँचाई पर हो चित्र टँगा,
पंछी उसके पीछे ले अपना नीड़ बना।
या जैसे कोई सिंह देख अपना शिकार,
कुछ दुबक, संकुचित हो धरती से सट जाए।
फिर अपनी पूरी शक्ति लगा भरकर उछाल,
कसमसा तीर-सा छूटे, उसे झपट खाए।
वैसे ही वह आजाद वीर वज्रांग बली,
दम साधे था अपने दुश्मन पर फट पड़ने।
कह रहा शक्ति का संचय था सक्रियता से,
साम्राज्यवाद के दुर्दम दानव से लड़ने।
अज्ञातवास ही केवल उसका लक्ष्य न था,
वह सूत्र क्रांति के धीरे-धीरे जोड़ रहा।
यौवन, जो होता चकाचौंध पर न्योछावर,
संघर्षों के पथ पर वह उसको मोड़ रहा।
उर्वरा भूमि में यत्न-लता लहलहा उठी,
कलियों ने आँखें खोली, श्रम ने फल पाए।
आजाद अकेला नहीं शत्रु के सम्मुख था,
विश्वस्त मित्र थे अब उसके दाँए-बाँए।
यौवन की आँधीं उठी वेग से हहराती,
लड़खड़ा उठी अत्याचारों की सजल घटा।
आराध्य देश, व्यक्तित्व श्लेष था उन सबका,
संकल्प-साधना अनुप्रास की दिव्य छटा।
जब सुखद नींव की घनी छाँह में, लोगों के,
यौवन के मीठे मादक सपने पलते थे।
कर्तव्य-सजग उनके अंतर भट्टी बनते,
संकल्प मुक्ति के, गोले जैसे ढलते थे।
संकल्प अकेले ढलते, ऐसी बात न थी,
निर्मित होते सचमुच विध्वंसक बम गोले।
था बारूदी उत्साह भड़क उठने आतुर,
सब तुले हुऐ थे, जो होना है सो होले।
हम भूख-प्यास जिस आवश्यकता को कहते,
उस दुर्बलता के आगे थे वे झुके नहीं।
उठ गए पाँव, तूफान ताकता रहा उन्हें,
वे आग और पानी से बाधित रुके नहीं।
क्या वास्तु विवशता है, उनने जाना न कभी,
भय क्या है उससे परिचय भी तो हुआ नहीं।
घर की सीमाओं ने उनको बाँधा न कभी,
अपनों की ममता ने उनका मन छुआ नहीं।
आजाद, देश की आजादी था खोज रहा,
संघर्ष-शील मन के संकल्पों के वन में।
हर साँस दासता से भारी-भारी लगती,
कस रही खाल थी उसकी, माँ के बंधन में।
भुजदंड फड़कते थे अरि का मर्दन करने,
वह दाँत पीसता था उसको खा जाने को।
उसका यौवन था प्रलय मेघ-सा घुमड़ रहा,
धरती के दुश्मन पर विनाश बरसाने को।
था सूँघ रहा शासन भी उसकी गतिविधियाँ,
वह डाल रहा था जाल, उसे उलझाने को।
बढ़ रहीं समस्याएँ थीं उसकी दिन-दूनी,
आजाद चाहिए था उनको सुलझाने को।
हथकड़ियाँ थीं बेचैन वरण करने उसका,
वे आस लगाए उसकी बैठी थीं क्वाँरी।
ससुराल बने, यह कारागृह की साध रही।
कर रहे सभी थे धूमधाम से तैयारी।
बढ़ रहे भाव, आजाद अकड़ता जाता था,
था माँग रहा यह भी दहेज में आजादी।
शासन ससुरा, यह देने को तैयार न था,
इस उलझन में थी अटक रही अब तक शादी।
जब देखा, उसको सभी दबाने तुले हुए,
सब उसे फाँसने डाल रहे घेरा भारी।
तो वह भी सबको धता बताकर निकल गया,
रम गया कहीं वह, बनकर बालब्रह्मचारी।
-०००-
[13]
ओरछा
अज्ञात योगी
ओरछा नाम, मैंने भी जीवन देखा,
मैं ग्राम-नगर दोनों की सीमा-रेखा।
खण्डहर, बीते वैभव की याद दिलाते,
अब लहाराते हैं खेत गाँव के नाते।
खण्डहर जिनमें साहित्य दबा सोता है,
उसकी साँसों का भास मुझे होता है।
लगता है, जैसे केशव बोल रहे हैं,
कानों में जैसे मधुरस घोल रहे हैं।
लगता है, जैसे इन्द्र-सभा मुखरित है,
लगता है, जैसे राज प्रजा का हित है।
लगता है, जैसे हर घर कला-निकेतन,
लगता, जैसे रस-सराबोर जड़-चेतन।
स्वर के झूलों पर राग झूलता दिखता,
गौरव से है हर वृक्ष फूलता दिखता।
कुछ छायाएँ, जैसे हिलती-डुलती हैं,
जैसे वे आपस में मिलती-जुलती हैं।
प्रेरणा यहाँ है प्राणवन्त कण-कण में,
युग के युग जैसे समा रहे हर क्षण में।
बीते वैभव की याद गर्व बनती है,
वह वर्तमान को पुण्य-पर्व बनती है।
चढ़ रही धूल यश पर यद्यपि विस्मृति की,
पर है विचित्र कुछ चाल समय की गति की।
कोई झोंका आता है धूल उड़ाता,
वह मेरे गौरव को फिर से चमकाता।
कुछ दिन पहले ही ऐसा झोंका आया,
वह मुझको बिलकुल नई चेतना लाया।
वह पवन झकोरा मनुज-देह-धारी था,
वह कोई पहुँचा हुआ ब्रह्मचारी था।
पूछा,तो बोला नाम हरीशंकर है,
जीवन बिलकुल आजाद, देश ही घर है,
जिस जगह लगा मन, योगी रम जाता है।
जीवन-प्रवाह कुछ दिन को थम जाता है।
उस योगी में कुछ कांति विलक्षण देखी,
अव्यक्त साधना उसमें हर क्षण देखी।
तन ऐसा, जैसे पैरुष देह धरे हो,
मन ऐसा, जैसे पूरा सिंधु भरे हो।
मुख पर ज्वलन्त जैसे संकल्प लिपे हों,
वाणी में जैसे अगणित भेद छिप हों।
आँखों में जैसे कोई लौ जलती हो,
संसृति, जैसे संकेतों पर चलती हो।
योगी की कुटिया थी सातार किनारे,
हो सिद्धि खड़ी जैसे साधन के द्वारे।
फलवती हुई हो जैसे कठिन तपस्या,
या लिए चुनौती कोई जटिल समस्या।
सातार, कि जैसे इच्छा मचल रही हो,
`चाँदी' जैसे आतप से पिघल रही हो।
चलती, तो चट्टानों से टकराती थी,
वह उछल-उछल संघर्ष गीत गाती थी।
कहती हो जैसे, जीवन केवल गति है,
गतिशील समय, गतिशील स्वयं संसृति है।
यदि बैठ गए थक कर, जीवन की यति है,
जीवन की यति, बस दुर्गति ही दुर्गति है।
वह कुटिया भी उसकी हाँ में हाँ भरती,
संघर्ष निरन्तर क्रुद्ध पवन से करती।
जर्जरित पात झोंकों से उड़ जाते थे,
योगी के श्रम से वे फिर जुड़ जाते थे।
वर्षा आती, तो छाजन रोक न पाता,
योगी कोने में सिमटा रात बिताता।
था शिशिर-समीरण, जैसे तीर चलाता,
हड्डी-हड्डी को भेद प्राण छू जाता।
कोई योगी को विचलित कर न सका था,
डर उसे डराता, पर वह डर न सका था।
अर्जुन-वृक्षों पर झुकता घना अंधेरा,
भूतों-प्रेतों का जैसे उन पर डेरा।
हर रात विकट भय की सराय होती थी,
जंगली हवा की साँय-साँय होती थी।
बाहर हू! हू! करके शृगाल रोते थे,
अच्छे-अच्छे अपना धीरज खोते थे।
थे कभी भयानक वन पशु शोर मचाते,
दरवाजे पर ही सिंह कभी आ जाते।
योगी, जैसे भय का दुर्भेद्य किला था,
पर्वत जैसा अविचल मन उसे मिला था।
श्रम उसके जीवन का अति पावन क्रम था,
बजरंग बली की पूजा नित्य-नियम था।
सिंदूरी चोला उन्हें चढ़ाया करता,
कुछ इधर-उधर भी वह हो आया करता।
जा रहा एक दिन था वह वन-प्रांतर में,
थे घुमड़ रहे कुछ भाव सजग अन्तर में।
आ निकट, पुलिस वालों ने उसको घेरा,
`सच-सच बतला क्या असल नाम है तेरा?
लगता, तू ही आजाद क्रांन्तिकारी है,
यह भेष बदल कर बना ब्रह्मचारी है।
हम अभी साथ ले चलते तुमको थाने,
सब आ जाएगी तेरी अकल ठिकाने।
योगी बोला, ``क्यों तुम सब मुझे सताते,
आजाद क्रांन्तिकारी क्यों मुझे बताते।
वैसे मैं हूँ आजाद क्योंकि योगी हूँ,
मैं नहीं किसी का चर वेतन-भोगी हूँ।
जिसने घर छोड़ा, बना ब्रह्मचारी है,
वह व्यक्ति कर्म से सदा क्रांन्तिकारी है।
पर छोड़ो इन बातों को तुम घर जाओ,
मैं हनूमान का भक्त, न मुझे सताओ।
बजंरग बली को चोला मुझे चढ़ाना,
जब जी चाहे, तुम भी प्रसाद ले जाना।
योगी ने उनको भरमाया बातों में,
क्या जीते उससे कोई प्रतिघातों में।
उनको टरका, योगी कुटिया पर आया,
निज इष्टदेव को आकर शीष नवाया।
बोला, ``बंजरगी! खूब बचाया तूने,
संकट में अच्छा मार्ग सुझाया तूने।
पकड़ा जाता तो हवा जेल की खाता,
सब किए कराए पर पानी फिर जाता।
तेरे बल पर मैं हर दम यही कहूँगा,
आजाद नाम, हरदम आजाद रहूँगा।
पैदा न हुआ कोई, जो मुझको पकड़े,
जंजीरों में मुझको क्या कोई जकड़े।
यह पुलिस, स्वयं हारेगी और थकेगी,
जीते जी, मेरी छाया छू न सकेगी।
-०००-
[14]
योग माया
अनुदिन प्रसरित योगी की ख्याति-परिधि थी,
बढ़ रही ब्याज जैसी ही यश की निधि थी।
सौरभ को क्या कोई बन्दी कर पाया?
क्या नहीं क्षितिज से सूरज बाहर आया?
विश्वास जहाँ जमता, श्रद्धा बढ़ती है,
वह तेज नशे जैसी मन पर चढ़ती है।
यश की निधि लूटे कभी नहीं लुटती है,
जितनी लूटो, वह दूनी आ जुटती है।
जब कीर्ति-कौमुदी फैल गई घर-घर में,
कुटिया का योगी था सबके अन्तर में।
लग गए भक्त-जन अब दर्शन को आने,
अर्पित करते थे लोग फूल, फल पाने।
थी एक साँझ, वह बेला गोधूली थी,
वन-प्रांतर में संध्या फूली-फूली थी।
वरदान प्रकृति ने शोभा का पाया था,
मन का हुलास, जैसे बाहर आया था।
योगी यह मोहक दृश्य निहार रहा था,
वह मन में उसका चित्र उतार रहा था।
उसकी तन्मयता में कुछ बाधा आई,
दी उसे मृदुल कोमल पदचाप सुनाई।
कुछ क्षण में ही उसके सम्मुख आकृति थी,
जैसे कि देह धर आई स्वयं प्रकृति थी।
तन की द्युति, जैसे फेनिल चन्द्र-छटा हो,
अलकावलि, जैसे श्यामल सजग घटा हो।
आँखें, जैसे दो झीलें भरी-भरी हों,
पुतलियाँ, कि जल में तिरती हुई तरी हों।
पलकें जैसे सीपियाँ मोतियों वाली,
करतीं बरौनियाँ निज धन की रखवाली।
भृकुटी, जैसे दो इन्द्र-धनुष उग आए,
चितवन, जैसे मन्थन ने तीर चलाए।
उर, जैसे लहराता तूफानी सागर,
करता हो जैसे अपना ओज उजागर।
वह यौवन, जैसे लेता हो अँगड़ाई,
साँसों में जैसे केशर-गंध समाई।
गति, जैसे गर्वीली नागिन लहराए,
जिस ओर चले, भारी उत्पात मचाए।
उत्पात उपस्थित योगी के सम्मुख था,
जैसे कि समन्वित हो आया सुख-दुख था।
दोनों अवाक्, दोनों हतप्रभ सम्मोहित,
जैसे प्रभाव हो पारस्परिक प्ररोहित।
युग जैसे भारी लगे उन्हें कुछ क्षण थे,
दोनों अंतर ही बोझिल भाव-प्रवण थे।
प्रकृतिस्थ भावनाएँ अब मौन मुखर था,
अब हुआ निनादित वीणा से मृदु स्वर था।
``कल्याण-कामना हेतु दवि! प्रस्तुत हूँ,
केवल साधक, मैं सिद्ध नहीं विश्रुत हूँ।
अभ्यास योग का है मेरा साधारण,
क्या पूछूँ मैं इस अमित कृपा का कारण?''
``मेरी पीड़ा का पूछ रहे हो कारण,
कारण भी तुम ही, उसके तुम्हीं निवारण।
सब जान-बूझ अनजान बन रहे योगी,
क्यों नहीं मुझे वरदान बन रहे योगी?
यह योग सधना किसके हित अपनाई?
चढ़ते यौवन में यह विरक्ति क्यों आई?
क्या साध किसी की रह जाएगी प्यासी?
यह रम्य रूप, मन में क्यों घनी उदासी?''
``वरदान बनूँगा कैसे मैं कल्याणी,
गृह-हीन पथिक, बिल्कुल नगण्य-सा प्राणी।
यह प्यास, प्यास है नहीं, मात्र विकृति है,
है तृप्ति एक इसकी, वह भाव-सुकृति है।
मैं स्वयं रूप का भक्त, रूप वह मन का,
सौन्दर्य नहीं होता है केवल तन का।
तुम जिसे रूप कहती हो, वह तो छल है,
वह रूप, आत्मा का ही केवल बल है।''
मैं मन देती योगी! तुम मुझको बल दो,
हम बनें मनोबल, जीवन को संबल दो।
दो तन होकर, हम एक रूप हो जाएँ,
जिस लिए मिला जीवन, उसका फल पाएँ।
``तुम पुरुष, औरर मैं प्रकृति-स्वरूपा नारी,
हम दोनों ही सह-जीवन के अधिकारी।
मनु के आगे श्रद्धा हो रही समर्पित,
हम करें आज नव-जीवन, नव-रस अर्जित।
तुम शक्ति स्वरूपा, फिर क्यों सह दुर्बलता,
क्या शोभित नारी को इतनी चंचलता?
कुल-शील आदि कुछ ज्ञात नहीं है मेरा,
क्यों व्यक्त अपरिचित के प्रति स्नेह घनेरा?
``है प्रणय नहीं दुर्बलता, शाश्वत बल है,
यह मानव जीवन का पावन शतदल है।
अनुबंध प्रणय का कोई पाप नहीं हैं,
वरदान प्रणय है, वह अभिशाप नहीं है।
कुल-शील नहीं निर्णायक कभी प्रणय के,
कुल-शील नहीं बन्धन हैं कभी हृदय के।
पल एक बहुत है, दो अन्तर मिल जाने,
रवि-रश्मि एक है बहुत कमल खिल जाने।
तुम मेरे हो, जब से तुमको देखा है,
व्यवधान नहीं अब विधि-निषेध रेखा है।
पल भर में ही तुमको पहचान लिया है,
मैंने तुमको बस अपना मान लिया है।''
``अनुबन्ध देवि! दो हृदयों में होता है,
उर एक, प्रणय का भार नहीं ढोता है।
दो हाथों से बजती सदैव है ताली,
मेरा अन्तर इस प्रणय-भाव से खाली।''
मैं हूँ निवेदिता, हृदय दे रही तुमको,
मीठे सपनों का निलय दे रही तुमको।
योगी, यह सब स्वीकार किया जाता है,
इन भावों का सत्कार किया जाता है।
जो ठुकराता है प्यार, बहुत पछताता,
लगता है उसको शाप, बहुत दुख पाता।
अष्शिप्त बनो मत, जीवन का सुख पाओ,
वरदान स्वयं घर आया है, अपनाओ।''
``हूँ विवश देवि! मैं तिल भर नहीं हिलूँगा,
इस जीवन में तो तुमको नहीं मिलूँगा।
मेरे जीवन में नारी केवल माँ है,
वह ज्योतित पूनम है, वह नहीं अमा है।
तपते जीवन को, माँ शीतल छाया हैं,
माँ से महानता ने भी बल पाया है।
आना है तो अगले जीवन में आना,
माँ बन कर मुझको अपने गले लगाना।''
``योगी! सचमुच तुम जीत गए मैं हारी,
तुम पुरुष नहीं हो हो कोई अवतारी।
अनुभूति आज की अमर प्रेरणा होगी,
हों माया के अपराध क्षमा, हे योगी।
तुम हो जिसने नारी को विवश किया है,
जीवन बिल्कुल ही मुझको नया दिया है।
जो व्रत-साधा तुमने, पूरा वह व्रत हो,
उस दिव्य-साधना से जन-जन उपकृत हो।''
-०००-
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