<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss'><id>tag:blogger.com,1999:blog-12232924</id><updated>2009-02-20T16:27:47.931-08:00</updated><title type='text'>चन्द्रशेखर आजाद महाकाव्य</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://aazadsaral.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aazadsaral.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>डॉ॰ व्योम</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10667912738409199754</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>7</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-12232924.post-115106668149934805</id><published>2006-06-23T05:38:00.001-07:00</published><updated>2006-06-23T05:44:41.510-07:00</updated><title type='text'>अध्याय तीन</title><content type='html'>( ३)&lt;br /&gt;भावरा&lt;br /&gt;ग्राम-धरा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंजरित इस आम्र-तरु की छाँह में बैठो पथिक ! तुम,&lt;br /&gt;मैं समीरण से कहूँ, वह अतिथि पर पंखा झलेगा।&lt;br /&gt;गाँव के मेहमान की अभ्यर्थना है धर्म सबका,&lt;br /&gt;वह हमारे पाहुने की भावनाओं में ढलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नागरिक सुकुमार सुविधाएँ, सुखद अनुभूतियाँ बहु,&lt;br /&gt;दे कहाँ से तुम्हें सूखी पत्तियों का यह बिछावन।&lt;br /&gt;आत्मा की छाँह की, पर तुम्हें शीतलता मिलेगी,&lt;br /&gt;ग्राम-अन्तर की मिलेगी भावना पावन-सुहावन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और परिचय मैं बता दूँ, भावरा कहते मुझे सब,&lt;br /&gt;जो घुमड़ती ही रहे, उस याद जैसा गाँव हूँ मैं।&lt;br /&gt;छोड़ जाता जो समय के वक्ष पर दृढ़-चिह्न अपना,&lt;br /&gt;अंगदी व्यक्तित्व का अनगढ़ हठीला पाँव हूँ मैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभ्यता की वर्ण-माला की लिखी पहली लिखावट,&lt;br /&gt;सुभग मंगल तिलक-सा हूँ, संस्कृति के भाल पर मैं।&lt;br /&gt;हो रहा संकैंच, कैसे मैं बखानूँ रूप अपना,&lt;br /&gt;एक तिल जैसा हुआ प्रस्थित प्रकृति के गाल पर मैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिरि-शिखरियों के सुहावन सुखद आँगन में अवस्थित,&lt;br /&gt;छू रही नभ कैं हठीली विंध्य-पर्वत की भुजाएँ।&lt;br /&gt;लग रहा, जैसे प्रकृति के पालने में झूलता मैं,&lt;br /&gt;गगन के छत से बँधी ये डोरियाँ गिरि-मेखलाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या कि माँ की गोद में, मैं दुबक कर बैठा हुआ-सा,&lt;br /&gt;माँगती मेरे लिए वह, हाथ ऊँचे कर दुआएँ।&lt;br /&gt;या पिलाने दूध, आँचल ओट माँ ने कर लिया हो,&lt;br /&gt;ले बलैंया, टालती हो वह सभी मेरी बलाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या कि नटखट एक बालक ओट लेकर छिप गया हो,&lt;br /&gt;माँ प्रकट हो, उछल औचक हूप! कर उसकैं डराने।&lt;br /&gt;चौंकती-सी देख उसकैं, डर गई! कहकर चिढ़ाने,&lt;br /&gt;डाल गलबहियाँ, विजय के गर्व से फिर खिलखिलाने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अब इस ओर देखो, ताल यह जल से भरा जो,&lt;br /&gt;चमकता ऐसे, चमकता जिस तरह श्रम का पसीना।&lt;br /&gt;या कि पर्वत-शृंखला की प्रिय अँगूठी में जड़ा हो,&lt;br /&gt;जगमगाता शुभ्र शुभ अनमोल सुन्दर-सा नगीना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या कि वृत्ताकार दर्पण, हो खचित वर्तुल परिधि में,&lt;br /&gt;शैल-मालाएँ सँवर कर रूप इसमें झाँकती हों।&lt;br /&gt;स्वच्छ, जैसे दूधिया चादर बिछाई हो किसी ने,&lt;br /&gt;फूल-पुरइन, उँगलियाँ जैसे सितारे टाँकती हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखते हो तुम पथिक! तरु वृन्द अपने पास ही जो,&lt;br /&gt;ये सुकृत जैसे, समय अनुकूल फलते-फूलते हैं।&lt;br /&gt;झूमने लगते कभी फल-भार के उन्माद से ये,&lt;br /&gt;चढ़ समीरण के हिंडोले पर कभी ये झूलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात है इन पर उतरती, साधना की शान्ति जैसी,&lt;br /&gt;और उजले दिन कि जैसे तेज हो तप का विखरता।&lt;br /&gt;शान्ति मन में, पर यहाँ संघर्ष जीवन में निरन्तर,&lt;br /&gt;कर्म की आराधना से, मन यहाँ सब का निखरता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्राम-वासी लोग, जैसे साधना-रत कर्मयोगी,&lt;br /&gt;सन्त जैसे सरल मन, अवधूत जैसे आदिवासी।&lt;br /&gt;पुण्य के प्रति नित विचारों में प्रगति मिलती यहाँ पर,&lt;br /&gt;और मिलती पाप के प्रति यहाँ जीवन में उदासी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्राम-घर, ऊँचे भवन कुछ, संकुचित-सी कुछ झुपड़िएँ,&lt;br /&gt;बहुरिएँ, ज्यों ससुर जी को देखकर शरमा गईं हों।&lt;br /&gt;कुछ अटरिएँ धवल, शोभित हैं घरौदों में कि जैसे,&lt;br /&gt;बाल-मुख में दूध की कुछ-कुछ दँतुलिएँ आ गई हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अब अनमोल निधि अपनी दिखाऊँ पथिक तुमको,&lt;br /&gt;सिंह जैसी खोह-सी यह झोंपड़ी जो दिख रही है।&lt;br /&gt;यह प्रगति के पत्र पर अपनी अगति की लेखनी से,&lt;br /&gt;गर्व की लिपि में विगत गौरव कथाएँ लिख रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन था जब कि इसकी कोख की पीड़ा फली थी,&lt;br /&gt;एक दिन आया कि सोया भाग्य जब इसका जगा था।&lt;br /&gt;एक ऐसा दिन सुनहला आ गया इस झोंपड़ी में,&lt;br /&gt;चन्द्रशेखर नाम से जब शौर्य का सूरज उगा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिल गई थी ज्येति घर को, लाल गुदड़ी को मिला था,&lt;br /&gt;उल्लसित ममतामयी माँ को मिला था शिशु सलोना।&lt;br /&gt;वंश को दीपक, पिता को सिंह-शावक मिल गया था,&lt;br /&gt;गाँव वालों को मिला था खेलता-हँसता खिलौना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरल शैशव को मिले जब बालपन के चपल पग, तो,&lt;br /&gt;गाँव घर था, और क्रीड़ागार थे मैदान जंगल।&lt;br /&gt;वह प्रकृति की पाठशाला में खुला भू-ज्ञान पढ़ता,&lt;br /&gt;साथियों के साथ वन में वह मनाता मोद-मंगल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो गए गिरि-शृंग बौने, हौसले ऊँचे हुए थे,&lt;br /&gt;जब हुआ मन, चन्द्रशेखर जंगलों को छानता था।&lt;br /&gt;नापता रहता विटप बट, आम्र, पीपल, ताड़ के वह,&lt;br /&gt;शैल का हर शिखर झुकता और लोहा मानता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भील-बालक, बाल-सेना के सभी सैनिक सुभट थे,&lt;br /&gt;जंगलों में तीर-कमठे ले सभी निर्भय विचरते।&lt;br /&gt;साधते सच्चे निशाने, होड़ आपस में लगाकर,&lt;br /&gt;हिंस्र-पशु इस सैन्य-दल की गंध पाकर ही सिहरते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन बालक अहेरी भटक कर जा दूर निकले,&lt;br /&gt;अगम पर्वत की ढलानों पर जमा जंगल घना था।&lt;br /&gt;एक झाड़ी से उछल कर गुरगुराता सिंह 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प्रस्ताव झट से,&lt;br /&gt;दीर्घ-जीवी मित्र हो, माँगें सभी प्रभु से दुआएँ।&lt;br /&gt;हो न यदि आपत्ति ब्राह्मण-देवता को तो सभी मिल,&lt;br /&gt;सिंह का आमिष बना, सहभोज कर खुशियाँ मनाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चन्द्रशेखर की परीक्षा थी, खरा उत्तर दिया यह,&lt;br /&gt;मानता, कुल-धर्म आमिष-भोज की अनुमति न देता।&lt;br /&gt;साथियों का साथ देना, एक यह भी धर्म मेरा,&lt;br /&gt;है नहीं मानव, समय ही धर्म का होता प्रणेता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पल की देर होती, सिंह हमको फाड़ खाता,&lt;br /&gt;मान्य है प्रस्ताव अपने शत्रु को हम फाड़ खाएँ।&lt;br /&gt;प्यास मानव-रक्त से अपनी बुझाने जो चला था,&lt;br /&gt;कर उसे उदरस्थ हम भी भूख अब अपनी मिटाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम समय की माँग को पूरा करेंगे साथ देकर,&lt;br /&gt;हम निरीहों पर सदय हो, सतत संरक्षण करेंगे।&lt;br /&gt;जो हमारी जान का ग्राहक बने, कैसे बचेगा,&lt;br /&gt;हम न छोड़ेंगे उसे संहार कर, भक्षण करेंगे।&lt;br /&gt;--०००--&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12232924-115106668149934805?l=aazadsaral.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aazadsaral.blogspot.com/feeds/115106668149934805/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=12232924&amp;postID=115106668149934805' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/115106668149934805'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/115106668149934805'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aazadsaral.blogspot.com/2006/06/blog-post_23.html' title='अध्याय तीन'/><author><name>डॉ॰ व्योम</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10667912738409199754</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='07918652778961711634'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-12232924.post-115106667457828930</id><published>2006-06-23T05:38:00.000-07:00</published><updated>2006-06-23T05:44:34.593-07:00</updated><title type='text'>अध्याय तीन</title><content type='html'>( ३)&lt;br /&gt;भावरा&lt;br /&gt;ग्राम-धरा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंजरित इस आम्र-तरु की छाँह में बैठो पथिक ! तुम,&lt;br /&gt;मैं समीरण से कहूँ, वह अतिथि पर पंखा झलेगा।&lt;br /&gt;गाँव के मेहमान की अभ्यर्थना है धर्म सबका,&lt;br /&gt;वह हमारे पाहुने की भावनाओं में ढलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नागरिक सुकुमार सुविधाएँ, सुखद अनुभूतियाँ बहु,&lt;br /&gt;दे कहाँ से तुम्हें सूखी पत्तियों का यह बिछावन।&lt;br /&gt;आत्मा की छाँह की, पर तुम्हें शीतलता मिलेगी,&lt;br /&gt;ग्राम-अन्तर की मिलेगी भावना पावन-सुहावन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और परिचय मैं बता दूँ, भावरा कहते मुझे सब,&lt;br /&gt;जो घुमड़ती ही रहे, उस याद जैसा गाँव हूँ 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प्रभु से दुआएँ।&lt;br /&gt;हो न यदि आपत्ति ब्राह्मण-देवता को तो सभी मिल,&lt;br /&gt;सिंह का आमिष बना, सहभोज कर खुशियाँ मनाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चन्द्रशेखर की परीक्षा थी, खरा उत्तर दिया यह,&lt;br /&gt;मानता, कुल-धर्म आमिष-भोज की अनुमति न देता।&lt;br /&gt;साथियों का साथ देना, एक यह भी धर्म मेरा,&lt;br /&gt;है नहीं मानव, समय ही धर्म का होता प्रणेता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पल की देर होती, सिंह हमको फाड़ खाता,&lt;br /&gt;मान्य है प्रस्ताव अपने शत्रु को हम फाड़ खाएँ।&lt;br /&gt;प्यास मानव-रक्त से अपनी बुझाने जो चला था,&lt;br /&gt;कर उसे उदरस्थ हम भी भूख अब अपनी मिटाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम समय की माँग को पूरा करेंगे साथ देकर,&lt;br /&gt;हम निरीहों पर सदय हो, सतत संरक्षण करेंगे।&lt;br /&gt;जो हमारी जान का ग्राहक बने, कैसे बचेगा,&lt;br /&gt;हम न छोड़ेंगे उसे संहार कर, भक्षण करेंगे।&lt;br /&gt;--०००--&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12232924-115106667457828930?l=aazadsaral.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aazadsaral.blogspot.com/feeds/115106667457828930/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=12232924&amp;postID=115106667457828930' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/115106667457828930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/115106667457828930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aazadsaral.blogspot.com/2006/06/blog-post.html' title='अध्याय तीन'/><author><name>डॉ॰ व्योम</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10667912738409199754</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='07918652778961711634'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-12232924.post-113077629027872948</id><published>2005-10-31T08:28:00.000-08:00</published><updated>2005-10-31T08:31:30.286-08:00</updated><title type='text'>चन्द्रशेखर आजाद-15,16,17,18,19,20,21,22</title><content type='html'>चन्द्रशेखर आज़ाद महाकाव्य&lt;br /&gt;भाग-&lt;br /&gt;15&lt;br /&gt;कानपुर&lt;br /&gt;प्राणों की मशाल&lt;br /&gt;मैं शहर कानपुर, भारत का उद्योग नगर,&lt;br /&gt;मैं वह साँचा हूँ, जिसमें लक्ष्मी ढलती है।&lt;br /&gt;मैं पल भर भी थक कर विश्राम नहीं लेता,&lt;br /&gt;दिन-रात, सुबह या शाम जिन्दगी चलती है।&lt;br /&gt;मेरे जीवन का मूल-मन्त्र केवल श्रम है,&lt;br /&gt;गंगा जैसा ही पावन मुझे पसीना है।&lt;br /&gt;यदि आप कहें, यह जीवन एक अंगूठी है,&lt;br /&gt;मैं कहूँ, पसीना ही उसका अनमोल नगीना है।&lt;br /&gt;दिन-रात, वयोगी उर के सतत प्रज्ज्वलन-सी,&lt;br /&gt;धू-धू करके भट्टियाँ प्रचण्ड दहकती हैं।&lt;br /&gt;इस्पात पिघल जाता स्नेहिल अन्तर-सा,&lt;br /&gt;शुभ अगरु-धूप-सी साँसें नित्य महकती हैं।&lt;br /&gt;श्रम अर्थ-व्यवस्था के क्षय से पीड़ित रहता,&lt;br /&gt;श्रम का फल कोई पाए तो कैसे पाए।&lt;br /&gt;पूँजीवादी अन्तर की स्वार्थ-साधना-सी&lt;br /&gt;चिमनियाँ खड़ी रहतीं सुरसा-सा मुँह बाए।&lt;br /&gt;मन की विकृतियों जैसा धुँआ उगलतीं वे,&lt;br /&gt;उनकी कालिख जन-जीवन पर छा जाती है।&lt;br /&gt;जीवन पर छाई यह कालिख तब उड़ती है,&lt;br /&gt;प्रज्ज्वलित क्रांति की जब आँधी आ जाती है।&lt;br /&gt;आँधियाँ अनेकों मैंने ऐसी देखी हैं,&lt;br /&gt;भूकम्प कई भीषण मेरे घर आए हैं।&lt;br /&gt;मानव होकर जो मानव का शोषण करते&lt;br /&gt;अपनी लपटों से उनके मुँह झुलसाए हैं।&lt;br /&gt;संघर्ष उठाए, मेरे उग्र विचारों ने,&lt;br /&gt;तूफान भयंकर इन साँसों ने झेले हैं।&lt;br /&gt;जिन्दगी धरोहर रखी नहीं फूलों के घर,&lt;br /&gt;मैंने काँटों के खेल अनेकों खेले हैं।&lt;br /&gt;मेरी आँखों में घूम रहा सन् सत्तावन,&lt;br /&gt;जब मुक्ति-समर में मेरे शेर दहाड़े थे।&lt;br /&gt;युद्धोन्माद ने भीषण प्रलय मचाया था,&lt;br /&gt;वे झपट पड़े तो शत्रु कलेजे फाड़े थे।&lt;br /&gt;फिर क्रांन्ति-काल के वे दिन जब लपटें नाचीं,&lt;br /&gt;पिस्तौलों ने जब मचल भैरवी गाई थी।&lt;br /&gt;बम के गोलों ने भड़क-भड़क कर ताल दिया,&lt;br /&gt;अंग्रेजों की तब अकल ठिकाने आई थी।&lt;br /&gt;वे सिंह-सूरमा एक-दूसरे से बढ़कर,&lt;br /&gt;बन गया कानपुर उनके लिए अखाड़ा था।&lt;br /&gt;लोहू से उनने रंगा क्रान्ति के झण्डे को,&lt;br /&gt;साम्राज्यवाद की छाती पर ही गाड़ा था।&lt;br /&gt;जब डूब गए कुछ तारे, कुछ टिमटिमा रहे,&lt;br /&gt;आजाद, गगन में धूमकेतु-सा आया था।&lt;br /&gt;साम्राज्यवाद के पैरों की धरती खिसकी,&lt;br /&gt;सत्यानाशी फल उसने उन्हें चखाया था।&lt;br /&gt;जाने कितनी थी आग विचारों में उसके,&lt;br /&gt;संकेतों में ज्वालामुखियों का नर्तन था।&lt;br /&gt;बलिपंथी पागल पर्वानों को साथ लिए,&lt;br /&gt;वह एक नए युग का कर रहा प्रवर्तन था।&lt;br /&gt;रौंदा करता था शत्रु-कलेजे मचल-मचल,&lt;br /&gt;वह क्रुद्ध प्रभंजन जैसी भीषण चाल लिए।&lt;br /&gt;वह खोज रहा था भारत की आजादी को,&lt;br /&gt;अपने प्राणों की जलती हुई मशाल लिए।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;भाग - 16&lt;br /&gt;अखण्ड भारत&lt;br /&gt;मैं नगर कानपुर, भूल नहीं पाता वह दिन,&lt;br /&gt;जब आसमान से सूरज आग उगलता था।&lt;br /&gt;लगता था, जैसे किरणें गर्म सलाखें हैं,&lt;br /&gt;धरती का चप्पा-चप्पा उनसे जलता था।&lt;br /&gt;लू के प्रवाह का क्रुद्ध प्रवर्तन ऐसा था,&lt;br /&gt;जैसे कि भयंकर आग पिघल कर आई हो।&lt;br /&gt;या प्रलय-सूर्य ने स्वयं आगमन के पहले&lt;br /&gt;आगमन-सूचना की पत्रिका पठाई हो।&lt;br /&gt;लगता था, जैसे, सौ-पचास भट्टियाँ नहीं,&lt;br /&gt;बन गया नगर ही एक बड़ा-सा भट्टा है।&lt;br /&gt;चिमनियों, धुएँ के असित-रंग-आकर्षण से,&lt;br /&gt;आतप सारा का सारा यहाँ इकट्ठा है।&lt;br /&gt;सारा का सारा नगर एक भारी कढ़ाह,&lt;br /&gt;जिसमें पड़कर चेतन-जीवन खलबला रहा।&lt;br /&gt;लू के झोंके कर देते जीवन अस्त-व्यस्त,&lt;br /&gt;जैसे कढ़ाह में कोई कोंचे चला रहा।&lt;br /&gt;ऐसे आलम में लोग प्राण-रक्षा करने,&lt;br /&gt;दुबके बैठे अपने-अपने घर के बिल में।&lt;br /&gt;कुछ कर्मयोग के साधक उस दोपहरी में,&lt;br /&gt;लड़ रहे धूप से, आग लिए अपने दिल में।&lt;br /&gt;आजाद साथ दल के, था वन-वन भटक रहा,&lt;br /&gt;लग गई पुलिस को गंध, नगर वह छान रही।&lt;br /&gt;जितने अनियारी मूँछों वाले हाथ लगे,&lt;br /&gt;वह पकड़-पकड़ कर उन सबको पहचान रही।&lt;br /&gt;तप रही तवा जैसी धरती, पर वीर उधर,&lt;br /&gt;था रौंद रहा वन को, वह दावानल जैसा।&lt;br /&gt;जैसे कोई औघड़ हो, जीत रहा ऋतु को,&lt;br /&gt;या धुनी भटकता हो कोई पागल जैसा।&lt;br /&gt;अपने मित्रों के प्रति उसका उद्बोधन था,&lt;br /&gt;साथियो! आज जीवन की सही समीक्षा है।&lt;br /&gt;यह धूप न केवल अपने लिए चुनौती है,&lt;br /&gt;यौवन के उन्मादों की कठिन परीक्षा है।&lt;br /&gt;तप रहे खून की गर्मी से, क्या धूप उन्हें,&lt;br /&gt;चाँदनी समझ उसको, वे रास रचाते हैं।&lt;br /&gt;जो अपने यौवन की ही आग लिए फिरते,&lt;br /&gt;वे किसी लपट से दामन नहीं बचाते हैं।&lt;br /&gt;जिनके यौवन का खून खौलता नहीं कभी,&lt;br /&gt;वे आग और लपटों की चर्चा करते हैं।&lt;br /&gt;जिनके शोणित में आग प्रवाहित होती है,&lt;br /&gt;ज्वालाओं के तल में वे लोग उतरते हैं।&lt;br /&gt;हम मस्तक अपने रख हथेलियों पर फिरते,&lt;br /&gt;कोई प्रचण्ड आतप क्या हमें डराएगा।&lt;br /&gt;अपने सर से हम कफन बाँध कर ही निकले,&lt;br /&gt;क्यों काल नहीं फिर हमसे मुँह की खाएगा।&lt;br /&gt;हम आज़ादी की देवी को करने प्रसन्न,&lt;br /&gt;अपने प्राणों के पुष्पहार लेकर निकले।&lt;br /&gt;निश्चित है, उसकी भेंट चढ़ेंगे ही हम सब,&lt;br /&gt;हम में से कुछ, कुछ पीछे, या कुछ, कुछ पहले।&lt;br /&gt;इसलिए प्रतिज्ञा करें कि कोई दुर्बलता,&lt;br /&gt;दल के गौरव पर कालिख नहीं लगाएगी।&lt;br /&gt;यदि देशद्रोह की गंध तनिक भी आई, तो,&lt;br /&gt;गोली ही उसको अनुशासन समझाएगी।&lt;br /&gt;जो मानचित्र खींचा है हमने भारत का,&lt;br /&gt;अपने शोणित, का हम सब उसमें रंग भरें।&lt;br /&gt;जीवन में और मरण में एक-दूसरे के-&lt;br /&gt;हम साथ रहेंगे, मिलकर यह संकल्प करें।&lt;br /&gt;लग गई होड़, 'यह लो ! यह लो!` कहकर सबने,&lt;br /&gt;अपने हाथों से अपना-अपना खून दिया।&lt;br /&gt;जो मानचित्र खींचा अखण्ड भारत का था,&lt;br /&gt;उसको रंग कर, जीवन को जोश-जुनून दिया।&lt;br /&gt;--०००--&lt;br /&gt;भाग - 17&lt;br /&gt;आगरा&lt;br /&gt;आग का घर&lt;br /&gt;जिसके अन्तर में पौरुष की है आग भरी&lt;br /&gt;मैं उसी आग का हूँ, आगरा कहाता हूँ।&lt;br /&gt;सब जुल्म-जोर के जल जाते हैं घास पात,&lt;br /&gt;जब आँख बदल कर मैं अपनी पर आता हूँ।&lt;br /&gt;मेरी सड़कों, गलियों, या कूचे-कूचे में,&lt;br /&gt;भारत का है गौरव-शाली इतिहास छिपा।&lt;br /&gt;मेरी अलसाई आँखों में पतझार छिपा,&lt;br /&gt;मेरी मदमाई आँखों में मधुमास छिपा।&lt;br /&gt;कह रहा कौन, आड़ा-तिरछा मेरा आँगन,&lt;br /&gt;कुछ लाल-धवल उस आँगन में पाषाण भरे।&lt;br /&gt;सच बात अगर सुनना चाहें, मुझसे सुनिए,&lt;br /&gt;मेरे पत्थर-पत्थर में जीवित प्राण भरे।&lt;br /&gt;भारत की संस्कृति का जय-घोष कर रही जो,&lt;br /&gt;वह यमुना भी मेरे घर होकर बहती है।&lt;br /&gt;मेरे वैभव के जो दिन उसने देखे हैं,&lt;br /&gt;वह उसकी गाथा हर दर्शक से कहती है।&lt;br /&gt;क्या ताजमहल का भी लेखा देना होगा?&lt;br /&gt;आश्चर्य विश्व का, किन्तु गर्व वह अपनों का।&lt;br /&gt;लगता है, जैसे कला देह धर आई है,&lt;br /&gt;या फूल खिला बैठा है सुन्दर सपनों का।&lt;br /&gt;या याद किसी की बर्फ बन गई है जम कर,&lt;br /&gt;या कीर्ति किसी की गई दूध से है धोई।&lt;br /&gt;या श्रम की साँसों की पावनता उग आई,&lt;br /&gt;या गढ़ कर ही रह गई दृष्टि उजली काई।&lt;br /&gt;कोई कुछ भी कहना चाहे कह सकता है,&lt;br /&gt;पर एक बात है, ताज ताज है भारत का।&lt;br /&gt;वह व्यक्ति-स्नेह की यादगार तो है ही, पर&lt;br /&gt;यह भी सच है वह मान आज है भारत का।&lt;br /&gt;यह नहीं कि स्वर की जमीं-लहरियाँ ही केवल,&lt;br /&gt;यह नहीं कि मेरे फूल-फूल ही महके हैं।&lt;br /&gt;लपटों ने भी गौरव की रखवाली की है,&lt;br /&gt;जब कभी आँच आई, अंगारे दहके हैं।&lt;br /&gt;आजादी के संघर्ष-काल के वे दिन, जब,&lt;br /&gt;उठ खड़े हो गए जगह-जगह कुछ दीवाने।&lt;br /&gt;उस महफिले की थी एक शमा भी जली यहाँ,&lt;br /&gt;आए थे जाने कहाँ-कहाँ से परवाने।&lt;br /&gt;सरकार फिरंगी उन्हें क्रांतिकारी कहती,&lt;br /&gt;वह चून बाँध कर उनके पीछे पड़ी हुई।&lt;br /&gt;वे भी तो उसके पीछे पड़े भूत जैसे,&lt;br /&gt;आजादी पर दोनों की गाड़ी अड़ी हुई।&lt;br /&gt;वे कहते, आजादी अधिकार हमारा है,&lt;br /&gt;अधिकार माँग कर नहीं, इसे लड़कर लेंगे।&lt;br /&gt;सरकार खुशी से नहीं दे रही, तो अब हम,&lt;br /&gt;आजादी इसकी छाती पर चढ़ कर लेंगे।&lt;br /&gt;हम नहीं याचनाएँ करने के विश्वासी,&lt;br /&gt;हम मार-मार कर इनके भूत भगाएँगे।&lt;br /&gt;हम गोली का, बमगोलों से उत्तर देंगे,&lt;br /&gt;आहुतियों से लपटों की भूख जगाएँगें।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;भाग -18&lt;br /&gt;चाँदनी और चट्टान-द्वीप&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन जब निकला चाँद, चाँदनी भी निकली,&lt;br /&gt;वह तेज नशे की हलकी हुई खुमारी सी।&lt;br /&gt;रेशमी-धवल साड़ी में धरा सुशोभित थी,&lt;br /&gt;अवगुण्ठित स्नेहिल विनय-शील सुकुमारी-सी।&lt;br /&gt;चाँदनी, कि जैसे कुशल चाँद जादूगर ने,&lt;br /&gt;दर्शक-दल पर अपनी मोहनी बिखेरी हो।&lt;br /&gt;या किरण-जाल फैला धरती को फाँस लिया,&lt;br /&gt;नभ के मचान पर बैठा चाँद अहेरी हो।&lt;br /&gt;चाँदनी, धरा पर दूती बन कर आई-सी,&lt;br /&gt;वह चाँद, प्रतीक्षा-रत जैसे अभिसारी हो।&lt;br /&gt;या जिसका मुँह फक हुआ जमा-पूँजी खोकर,&lt;br /&gt;वह चाँद, कि जैसे हारा हुआ जुआरी हो।&lt;br /&gt;चाँदनी, कि जैसे उजली कीर्ति कलाधर की,&lt;br /&gt;दिशि-विदिशाओं में सुमन-सुरभि-सी फैली थी&lt;br /&gt;वह चाँद, सुकवि जैसे रहस्यवादी कोई,&lt;br /&gt;चाँदनी, कि, जैसे उसकी अपनी शैली थी।&lt;br /&gt;वह चाँद, फुहारों का हो जैसे छतनारा,&lt;br /&gt;धरती जैसे जी-भर मल-मल कर नहा रही।&lt;br /&gt;चाँदनी, कि जैसे स्वच्छ झाग हो साबुन का,&lt;br /&gt;या नभ की ग्वालिन दूध धरा पर बहा रही।&lt;br /&gt;मैं स्नात आगरा रूप-रंग-रस धारा में,&lt;br /&gt;स्वप्निल कल्पना-तरंगों में लहराया-सा।&lt;br /&gt;राका रजनी की रजत-रश्मियों से कर्षित,&lt;br /&gt;था ताज-क्षेत्र में जन-जीवन बौराया सा।&lt;br /&gt;कुछ यहाँ-वहाँ बैठे थे बिखरे-बिखरे से,&lt;br /&gt;गपशप करते मुकुलित सुरभित उद्यानों में।&lt;br /&gt;मखमली गलीचे जैसा हरित दूर्बा-दल,&lt;br /&gt;मृदु सिहरन भरता यौवन के अरमानों में।&lt;br /&gt;थी होड़ लगी, कुछ सुमन उधर, कुछ सुमन इधर,&lt;br /&gt;सौरभ-तंरग थी प्रसरित बहु-धाराओं में।&lt;br /&gt;कुछ भ्रमर उधर बन्दी थे सरसिज-संपुट में,&lt;br /&gt;मन हुए इधर बन्दी, तन की काराओं में।&lt;br /&gt;चाँदनी स्निग्ध-शीतल थी चन्दन जैसी, पर,&lt;br /&gt;बाजार गर्म था विविध भाव-अनुभावों का।&lt;br /&gt;थी कहीं उपालंभित प्रेमी की निष्ठुरता,&lt;br /&gt;हो रहा प्रदर्शन कहीं हृदय के घावों का।&lt;br /&gt;था मान-मनौवल कहीं, कहीं वादों की झड़,&lt;br /&gt;थी कहीं दुहाई दी जाती विश्वासों की।&lt;br /&gt;मीठे सपनों को सरसाती स्वर छेड़ रही,&lt;br /&gt;बाँसुरी कहीं मादक श्वासों-प्रश्वासों की।&lt;br /&gt;लगता, जैसे जीवन केवल वैभव-विलास,&lt;br /&gt;लगता, जैसे दुनिया केवल रस की धारा।&lt;br /&gt;लगता जैसे सौन्दर्य चक्रवर्ती शासक,&lt;br /&gt;लगता था, जैसे कोमल रूप कठिन कारा।&lt;br /&gt;मनुहार-प्यार के इस अगाध सागर में ही,&lt;br /&gt;संकल्प प्रखर भी थी कुछ बड़वानल जैसे।&lt;br /&gt;उठ रहा झाग फुसफुसा धरातल पर केवल,&lt;br /&gt;भूकम्प छिपाए हुए अतल का जल जैसे।&lt;br /&gt;आनन्द महासागर में दो चट्टान-द्वीप,&lt;br /&gt;कर रहे धरातल की गतियों का अनुशीलन।&lt;br /&gt;उनके कठोर संकल्पों में विस्फोट सजग,&lt;br /&gt;वे क्या जाने मन की कलियों का उन्मीलन।&lt;br /&gt;प्रतिमान द्वीप द्वय थे नगराज हिमालय के,&lt;br /&gt;उपलब्धि एक की तन-मन की उँचाई थी।&lt;br /&gt;संगठित, पुष्ट पौरुष की घनीभूत गरिमा,&lt;br /&gt;जो द्वीप दूसरा था, वह उसने पाई थी।&lt;br /&gt;यदि नामकरण अत्यावश्यक हो, तो कह दूँ,&lt;br /&gt;था भगतसिंह, पौरुष पंजाबी पानी का।&lt;br /&gt;आजाद, नाम था फौलादी संकल्पों का,&lt;br /&gt;वह चरम बिन्दु था तपती हुई जवानी का।&lt;br /&gt;ज्योत्सना-सरोवर में वे कमल-पत्र जैसे,&lt;br /&gt;मन तो क्या तन पर भी न बूँद क्षण भर ठहरी।&lt;br /&gt;रस की रुचि ऐसी, जैसे पानी की लकीर,&lt;br /&gt;कर्त्तव्य-सजगता पत्थर की रेखा गहरी।&lt;br /&gt;आजाद फुसफुसाया, ``क्या बुरा जमाना है,&lt;br /&gt;अभिशाप गुलामी का साँसों पर छाया है।&lt;br /&gt;यह यौवन है जो पिघल रहा शीतलता से,&lt;br /&gt;यह जीवन का आनन्द लूटने आया है।&lt;br /&gt;मन में आता है, अगर चले मेरा वश तो,&lt;br /&gt;वैभव-विलास के घर में आग लगा दूँ मैं।&lt;br /&gt;सम्मान बेच, सुख-नींद सो रहा जो समाज,&lt;br /&gt;जी करता, उसकी ठोकर मार जगा दूँ मैं।&lt;br /&gt;प्रतिरोध न करता जो यौवन अन्यायों का,&lt;br /&gt;जिस लाल खून में नहीं आग की गर्मी है।&lt;br /&gt;जिन साँसों में है लपटों जैसी लहक नहीं,&lt;br /&gt;जिन्दगी, जिन्दगी नहीं, बड़ी बेशर्मी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहमति सूचक `हाँ' भगतसिंह के स्वर में थी,&lt;br /&gt;उद्दाम मनोभावों का किया समर्थन था।&lt;br /&gt;उसके चिन्तन को तर्क सदा बनते खराद,&lt;br /&gt;इसलिए विनत हो प्रस्तुत यह संशोधन था।&lt;br /&gt;क्यों आग लगाएँ हम अपने समाज में ही,&lt;br /&gt;हम लोग गुलामी की ही चिता सजाएँगे।&lt;br /&gt;जिसने हमको अपने घर में घर-हीन किया,&lt;br /&gt;उसकी इंर्टों से अब हम ईंट बजाएँगे।&lt;br /&gt;आजादी अपना मूल्य माँगती है हमसे,&lt;br /&gt;हम अपने मीठे सपनों का बलिदान करें।&lt;br /&gt;जिसकी मिट्टी की गंध समाई साँसों में,&lt;br /&gt;जीवन देकर, उस धरती का सम्मान करें।&lt;br /&gt;उल्टी-सीधी, सीधी-उल्टी इसकी गति हैं,&lt;br /&gt;यह व्यक्ति-देश का भाग्य-चक्र ऐसे फिरता।&lt;br /&gt;मर-मिंटे व्यक्ति, तो देश सँवरता है उनका,&lt;br /&gt;यदि व्यक्ति सँवरते, देश बहुत नीचे गिरता।&lt;br /&gt;इसलिए करें संकल्प, नींव के पत्थर बन,&lt;br /&gt;छाती पर आजादी का महल उठायेंगे।&lt;br /&gt;हम नींव खून से जितनी-जितनी सींचेगे,&lt;br /&gt;उस मंजिल पर हम उतने शिखर चढ़ाएंगे।&lt;br /&gt;आजाद तड़प कर बोल उठा, `सुन भगतसिंह!&lt;br /&gt;यह खून देश का है, यह मेरा खून नहीं।&lt;br /&gt;जो मेरे संकल्पों की गति को रोक सके,&lt;br /&gt;इस शासन पर ऐसा कोई कानून नहीं।&lt;br /&gt;मैं प्रलय-मेघ-सा शासन पर मंडराऊँगा,&lt;br /&gt;मैं आजादी का पावन कमल खिलाऊँगा।&lt;br /&gt;प्यासी धरती को लोग पिलाते पानी, मैं-&lt;br /&gt;अपनी धरती को अपना खून पिलाऊँगा।&lt;br /&gt;मैं रक्त तिलक कर, वचन दे रहा हूँ तुझको,&lt;br /&gt;लोहित लहरों में तेरे साथ बहूँगा मैं।&lt;br /&gt;जब खूनी तूफानों में कूद पडेग़ा तू,&lt;br /&gt;उस तैराकी में पीछे नहीं रहूँगा मैं।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;चन्द्रशेखर आजाद महाकाव्य&lt;br /&gt;-श्रीकृष्ण सरल&lt;br /&gt;भाग- 19&lt;br /&gt;लाहौर&lt;br /&gt;प्यारे सपने&lt;br /&gt;लाहौर, नगर मैं टूटे हुए सितारे-सा,&lt;br /&gt;मैं ऐसा भटका, रहा ठिकाना-ठौर नहीं।&lt;br /&gt;लाहौर, बिंब हूँ मैं भारत के दर्पण का,&lt;br /&gt;मैं बदल गया हूँ फिर षी क्या लाहौर नहीं।&lt;br /&gt;लाहौर जगह वह-मिले जहाँ दो मोड़ मुझे,&lt;br /&gt;मै गलत दिशा में गलती से मुड़ आया हूँ।&lt;br /&gt;लाहौर, पात मैं भारत की ही डाली का,&lt;br /&gt;इस ओर हवा के झोंके से उड़ आया हूँ।&lt;br /&gt;कहते हैं टूटा पात न डाली पर लगता,&lt;br /&gt;क्या इस परवशता का मुझको कम खेद नहीं?&lt;br /&gt;जो चाहो रख दो नाम, नाम में क्या रक्खा,&lt;br /&gt;तुम राम कहो या मैं रहीम, कुछ भेद नहीं।&lt;br /&gt;धरती तो अब भी वही, जहाँ मैं पहले था,&lt;br /&gt;क्या आसमान टुकड़े-टुकडे हो पाया है?&lt;br /&gt;है हवा एक, जो दोनों घर आती जाती,&lt;br /&gt;प्रतिबन्ध किसी ने उस पर कभी लगाया है?&lt;br /&gt;इस बदले हुए जमाने में भी क्या बदला,&lt;br /&gt;दिल वही रहा, केवल विचार ही बदले हैं।&lt;br /&gt;दुलहिन की डोली वही, वही दुलहिन भी है,&lt;br /&gt;वे बदल न पाए, बस कहार ही बदले हैं।&lt;br /&gt;जो पाँख-पखेरू पहले थे, वे अब भी हैं,&lt;br /&gt;गाते तो वे ही गीत आज भी गाते हैं।&lt;br /&gt;यदि बदल गया कुछ, ऐनक ही तो बदला है,&lt;br /&gt;आँखों में अब भी वे ही सपने आते हैं।&lt;br /&gt;वह अंग्रेजों का जुल्म-सितम वरपा करना,&lt;br /&gt;कंधे से कंधा मिला, सभी का भिड़ जाना।&lt;br /&gt;वह बलिदानों की होड़, दौड़ कुर्बानी की,&lt;br /&gt;वह आजादी की जंग अनोखी छिड़ जाना।&lt;br /&gt;वह शान्ति-अहिंसा की भारत-माता की जय,&lt;br /&gt;वह आग क्रान्ति की, इन्कलाब का वह नारा।&lt;br /&gt;लगता था, जैसे ये बादल छंट जाएंगे,&lt;br /&gt;लगता था, अब हो जाएगा वारा-न्यारा।&lt;br /&gt;जो कुछ मैंने वारा वह, व्यर्थ हुआ सारा,&lt;br /&gt;मेरे पाँसे भी उल्टे सारे के सारे।&lt;br /&gt;मैं सोच रहा था अब वारे-न्यारे होंगे,&lt;br /&gt;दो भाई लड़कर किन्तु हुए न्यारे-न्यारे।&lt;br /&gt;वह तीर जहर में बुझा हुआ था दुश्मन का,&lt;br /&gt;कर गया काम, हम तड़पे और छटपटाए।&lt;br /&gt;जब न्याय-तराजू बन्दर के हाथों में थी,&lt;br /&gt;मिलना जाना क्या था, केवल आँसू पाए।&lt;br /&gt;आँसू बोए, तो भेद-भाव की बेल उगी,&lt;br /&gt;जब खिले फूल नफरत के, तो दुश्मनी फली।&lt;br /&gt;वे राम और रहमान साथ चलते थे जो,&lt;br /&gt;अब उन दोनों में आपस में तलवार चली।&lt;br /&gt;जो कुछ मैंने देखा, बयान के बाहर है,&lt;br /&gt;जो हुआ, हो गया वह, उसको हो जाने दो।&lt;br /&gt;मत छेड़ो उन घावों को, छिड़को नमक नहीं,&lt;br /&gt;दो घड़ी चैन पाऊँ, मुझको सो जाने दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो घड़ी नींद गहरी लग गई अगर मेरी,&lt;br /&gt;तो ये विचार फिर मुझको नहीं सताएंगे।&lt;br /&gt;वे अच्छे दिन हौले-हौले फिर उभरेंगे,&lt;br /&gt;आँखों में वे प्यार सपने फिर आएंगे।&lt;br /&gt;फिर रासबिहारी बोस यहाँ पर आएंगे,&lt;br /&gt;कर्तारसिंह को आकर गले लगाएंगे।&lt;br /&gt;कर्तारसिंह ने फंदा चूम लिया यदि तो,&lt;br /&gt;वे भतसिंह को वह मस्ती दे जायेंगे।&lt;br /&gt;पंजाब-केसरी भगतसिंह फिर गरजेगा&lt;br /&gt;हम लालाजी की हत्या का बदला लेंगे।&lt;br /&gt;सुखदेव! राजगुरु! ओ आजाद बली! आओ!&lt;br /&gt;हम हत्यारे को अच्छा एक सबक देंगे।&lt;br /&gt;आजाद पुकारेगा, ओ भैया भगतसिंह !&lt;br /&gt;मत समझ कि तू संकट में वहाँ अकेला है।&lt;br /&gt;जब कभी दोस्त का गिरा पसीना धरती पर,&lt;br /&gt;हँसते-हँसते आजाद जान पर खेला है।&lt;br /&gt;फिर कूद-फाँद आजाद यहाँ आ धमकेगा,&lt;br /&gt;आजादी के दीवाने गले मिलेंगे, फिर।&lt;br /&gt;सान्डर्स, गोलियों से फिर भूना जाएगा,&lt;br /&gt;उनकी पिस्तौलों से गुल कई खिलेंगे फिर।&lt;br /&gt;जब चनन सिंह झपटेगा भगतसिंह पर, तो&lt;br /&gt;आजाद गर्जना कर, ललकारेगा उसको।&lt;br /&gt;कर सुनी-अनसुनी चननसिंह यदि फिर लपका&lt;br /&gt;आजाद मौ के घाट उतारेगा उसको।&lt;br /&gt;फिर लिखा मिलेगा घर-घर गली-गली में यह&lt;br /&gt;लालाजी की हत्या का बदला चुका दिया।&lt;br /&gt;जो सर घमंड से अकड़ कर चलता था,&lt;br /&gt;थप्पड़ जड़कर उस सर को हमने झुका दिया।&lt;br /&gt;छेड़ेगा मुझको भगतसिंह अफसर बनकर,&lt;br /&gt;आजाद कीर्तन-मंडल एक बनाएगा।&lt;br /&gt;मैं झूम उठूँगा उसकी मस्ती देख-देख,&lt;br /&gt;मुझको सलाम करता-करता वह जाएगा।&lt;br /&gt;मैं रुखसत दूँगा उसे खुदा हाफिज कह कर,&lt;br /&gt;उसकी खुशहाली की मैं दुआ मनाऊँगा।&lt;br /&gt;अपनी गर्दन को झुका देख लेने उसको,&lt;br /&gt;मैं दिल पर ही उसकी तस्वीर बनाऊँगा।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;भाग- 20&lt;br /&gt;मीठा-मीठा दर्द&lt;br /&gt;तुम पूछ रहे हो मुझसे वे बीती बातें,&lt;br /&gt;शायद तुम मेरी दुखती नस पहचान गए।&lt;br /&gt;मैं करता हूँ महसूस दर्द मीठा-मीठा,&lt;br /&gt;अजनबी मुसाफिर! शायद तुम यह जान गए।&lt;br /&gt;तो सुनो, एक-दो बातें और बताता हूँ,&lt;br /&gt;आजाद, नहीं उसमें पंजाबी पानी था।&lt;br /&gt;पर जो पानी था, वह तेजाबी पानी था,&lt;br /&gt;क्या कहें खून की, वह सचमुच लासानी था।&lt;br /&gt;क्या सूझ-बूझ थी उसकी कार्य-व्यवस्था में,&lt;br /&gt;किसकी मजाल, जो एक नुक्स भी पा जाए।&lt;br /&gt;योजना, देख लेता था वह नस-नस उसकी,&lt;br /&gt;नामुमकिन क्या, जब वह अपनी पर आ जाए।&lt;br /&gt;हौसला, भला उसका मुकाबिला कहाँ मिला,&lt;br /&gt;जो मिले नहीं ढूँढ़े, वह विकट दिलेरी थी।&lt;br /&gt;जो आँख उठा कर देख सके वह आँख कहाँ?&lt;br /&gt;उसके आगे हिम्मत क्या तेरी-मेरी थी।&lt;br /&gt;संकल्प, बपौती में जैसे उसने पाए,&lt;br /&gt;आदर्श, स्वयं जैसे उसने अपनाए थे।&lt;br /&gt;निस्वार्थ त्याग, जैसे यह उसकी आदत थी,&lt;br /&gt;सच्चे नेता के गुण उसने सब पाए थे।&lt;br /&gt;उस दिन, जब छेड़ा बहुत साथियों ने उसको,&lt;br /&gt;गुस्से में आकर फेंक दिया अपना भोजन।&lt;br /&gt;साथी बोले-अफसोस हमे, पर पंडित जी!&lt;br /&gt;पैसे लेकर, यह करो दुबारा आयोजन।&lt;br /&gt;आजाद कड़क कर बोला, पैसे कहाँ रखे?&lt;br /&gt;ये पैसे यों ही मुफ्त नहीं आ जाते हैं।&lt;br /&gt;जो कोई देता, वह अपने दल को देता,&lt;br /&gt;हम भी उसको पूरा विश्वास दिलाते हैं ।&lt;br /&gt;कर्त्तव्य-भार हम पर भी यह आ जाता है,&lt;br /&gt;रक्खें हिसाब हम उनकी पाई-पाई का।&lt;br /&gt;खाने-पीने में पैसे नहीं उड़ाएँ वे,&lt;br /&gt;सम्मान करें हम दल की नेक कमाई का।&lt;br /&gt;अब निराहार ही आज मुझे रहना होगा,&lt;br /&gt;दल की निधि से, मैं पैसा एक नहीं लूँगा।&lt;br /&gt;मेरा ही दिल, यदि मुझसे पूछेगा हिसाब,&lt;br /&gt;क्या समझाऊँगा, उसको क्या उत्तर दूँगा।&lt;br /&gt;हाँ अगर चाहते तुम, मैं भूखा नहीं रहूँ,&lt;br /&gt;जो फेंक दिए नाली में चने, उठा लाओ।&lt;br /&gt;पानी से धोकर मैं उसको ही खाऊँगा,&lt;br /&gt;अन्तिम निर्णय है, मुझे नहीं तुम फुसलाओ।&lt;br /&gt;झख मार, उठाए गए चने नाली में से,&lt;br /&gt;वे ही उसने खाए, पानी से धो-धो कर।&lt;br /&gt;अतिरिक्त एक पाई भी उसने छुई नहीं,&lt;br /&gt;की नहीं खयानत उसने खुद नेता होकर।&lt;br /&gt;यह देख लिया तुमने, नेता क्या होता है,&lt;br /&gt;कैसे संयम से वह ईमान बचाता है।&lt;br /&gt;वह अपनी लम्बी जीभ नहीं फैलाता है,&lt;br /&gt;लेकर डकार, वह पैसे नहीं पचाता है।&lt;br /&gt;जो कुछ मिल जाए, हड़प नही लेता है वह,&lt;br /&gt;झाँसे देकर गुलछर्रे नहीं उड़ाता है।&lt;br /&gt;बेरहम नहीं होता वह, माले मुफ्त देख,&lt;br /&gt;काले धन पर वह लार नहीं टपकाता है।&lt;br /&gt;पर जाने भी दो, एक नहीं सौ बातें है,&lt;br /&gt;क्या-क्या बतलाऊँ, कैसे-कैसे समझाऊँ।&lt;br /&gt;हाँ, बहक गया मैं शायद बातों-बातों में,&lt;br /&gt;इसलिए लौट फिर उस किस्से पर ही आऊँ।&lt;br /&gt;आजाद, बात का धनी वचन का पक्का था,&lt;br /&gt;वह अगर ठान ले, टस-से-मस फिर क्या होना।&lt;br /&gt;आ पडे मुसीबत भारी से भी भारी, पर&lt;br /&gt;कुछ नहीं शिकायत-शिकवे, या रोना-धोना।&lt;br /&gt;दुर्भाग्य देखिए, भगतसिंह को जेल मिली,&lt;br /&gt;भगवतीचरण, बम फट जाने से नहीं रहे।&lt;br /&gt;शासन ने पकडे बम के कई कारखाने,&lt;br /&gt;इस तरह अनेकों उस दल ने आघात सहे।&lt;br /&gt;आजाद, किन्तु विचलित रत्ती भर नहीं हुआ,&lt;br /&gt;फिर लगा संगठन में वह पूरी ताकत से।&lt;br /&gt;शासन से समझौता करने वह झुका नहीं,&lt;br /&gt;वह बाज नहीं आया था कभी बगावत से।&lt;br /&gt;था कौल यही, दम में दम रहते जूझूँगा,&lt;br /&gt;गिन-गिन कर मैं शासन के दाँत उखाड़ूँगा।&lt;br /&gt;पिंजड़ा, वह मुझको पाने मुँह धोकर रक्खे,&lt;br /&gt;आजाद रहा, रहकर आजाद दहाड़ूँगा।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;भाग- 21&lt;br /&gt;दिल्ली&lt;br /&gt;इतिहास की करवटें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं दिल्ली हूँ, युग-युग से रही राजधानी,&lt;br /&gt;भारत के गौरव की प्रख्यात धुरी हूँ मैं।&lt;br /&gt;जो मेरे हैं, मैं उन्हें प्यार की गल-बाँही,&lt;br /&gt;जो शत्रु, कलेजे को विष-बुझी छुरी हूँ मैं।&lt;br /&gt;मेरी नजरों में इतिहासों के प्रलय-सृजन,&lt;br /&gt;हर नजर, खुमारी से बोझिल है बाकी है।&lt;br /&gt;जब ऐसी-वैसी नजर किसी ने फेंकी तो,&lt;br /&gt;उसकी छाती मैंने कीलों से टाँकी है।&lt;br /&gt;मैंने झेली है कड़ी-कड़कती धूप कभी,&lt;br /&gt;तो कभी दूधिया मैं चाँदनी नहाई हूँ।&lt;br /&gt;वैभव-विलास की चकाचौंध पर रीझी हूँ,&lt;br /&gt;पर नहीं कभी उसमें भटकी-भरमाई हूँ।&lt;br /&gt;मैं नहीं किसी की शोख नजर जैसी चंचल,&lt;br /&gt;जो प्यार छिपा कर रखता, मैं उस दिल जैसी।&lt;br /&gt;मैं नहीं किसी चौराहे जैसी भीड़-भाड़,&lt;br /&gt;जो जमे कायदे से, मैं उस महफिल जैसी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे गौरव की बात पूछते मुझसे ही,&lt;br /&gt;मदमाये फूलों और बहारों से पूछो।&lt;br /&gt;मैंने जीवन में कैसे-कैसे दिन देखे,&lt;br /&gt;सूरज से पूछो चाँद-सितारों से पूछो।&lt;br /&gt;हर कंकड़ ही कुछ लिए कहानी पड़ा हुआ,&lt;br /&gt;कुछ यश गाथा लेकर है हर मीनार खड़ी।&lt;br /&gt;तिलमिला गई, पर मैंने होश नहीं खोया,&lt;br /&gt;जब कभी मुसीबत की हैं मुझ पर मार पड़ी।&lt;br /&gt;आ पड़ी मुसीबत ऐसी ही मुझ पर तब थी,&lt;br /&gt;जब धोखे से लद गया फिरंगी शासन था।&lt;br /&gt;मैं हुंकारी, फुंकारी, झटके दिए कई,&lt;br /&gt;बन गया घोर विद्रोही मेरा जीवन था।&lt;br /&gt;सन सत्तावन में मेरा जौहर जागा, तो,&lt;br /&gt;मेरी लपटों ने खूनी रास रचाया था।&lt;br /&gt;अपने बेटों की आहुतियाँ मैंने दी थीं,&lt;br /&gt;पर भारत के गौरव को सदा बचाया था।&lt;br /&gt;वह जफर, चार बेटों की बलि दी थी उसने,&lt;br /&gt;आजादी के हित उनने शीष कटाए थे।&lt;br /&gt;वे कटे हुए सर रखे बाप के हाथों में,&lt;br /&gt;बर्बर अँग्रेजों ने ये रंग दिखाये थे।&lt;br /&gt;साम्राज्यवाद की खूनी प्यास बढ़ी इतनी,&lt;br /&gt;बहशी हडसन ने सचमुच उनका खून पिया।&lt;br /&gt;मैंने अपनी आँखों से यह सब कुछ देखा,&lt;br /&gt;मैं चीखी-चिल्लाई, पर किसने ध्यान दिया।&lt;br /&gt;कहते, आजादी बिना बहाए खून मिली,&lt;br /&gt;मैंने ऐसी-ऐसी कीमतें चुकाई हैं।&lt;br /&gt;मेरे बेटे फाँसी के फन्दों पर झूले,&lt;br /&gt;तब ये सुहावनी घड़ियाँ घर में आई हैं।&lt;br /&gt;तुम पूछ रहे कुर्बानी मेरे बेटों की,&lt;br /&gt;मेरी जबान पथराई, क्या कह पाऊँगी।&lt;br /&gt;बैठे, यह चित्रावली दे रही मैं तुमको,&lt;br /&gt;पन्ने पलटो, इसकी झाँकियाँ दिखाऊँगी।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;भाग- 22&lt;br /&gt;चित्र-विचित्र&lt;br /&gt;यह चित्र, तुम्हारी आँखों के सम्मुख है जो,&lt;br /&gt;चल-समारोह यह जाता दिखलाई देता।&lt;br /&gt;लगता, अँग्रेजी शासन का वैभव-विलास,&lt;br /&gt;इस तरह अकड़ कर ही यह अँगडाई़ लेता।&lt;br /&gt;यह शान-वान, यह ठाठ-बाट, गाजे-बाजे,&lt;br /&gt;दे रहे साथ सजधज कर, राजे-रजवाडे।&lt;br /&gt;यह कदम-कदम आगे बढ़ती पैदल सेना,&lt;br /&gt;ये घुड़सवार, हाथों में ही झण्डे गाड़े।&lt;br /&gt;यह घूम-झूम चलता पर्वत जैसा हाथी,&lt;br /&gt;यह सजी लाट साहब की आज सवारी है।&lt;br /&gt;भारतवासी चूँ करें, नहीं वह धाक जमे,&lt;br /&gt;इसलिए आज की यह सारी तैयारी है।&lt;br /&gt;यह चित्र इसी क्रम का है, यह भगदड़ कैसी?&lt;br /&gt;कह रहा धुँआ, यह बम का हुआ धड़ाका है।&lt;br /&gt;बच गए लाट साहब हैं बिलकुल बाल-बाल,&lt;br /&gt;उनके यश पर इस तरह पड़ा यह डाका है।&lt;br /&gt;मैंने लोगों से चर्चा की, तो बतलाया,&lt;br /&gt;यह काम किसी का नहीं, क्रांतिकारी दल का।&lt;br /&gt;बम-काण्ड योजना थी यह रासू दादा की,&lt;br /&gt;लग गया पता अब शासन को उनके बल का।&lt;br /&gt;लो पलट दिया यह पृष्ठ, दूसरा चित्र दिखा,&lt;br /&gt;हो रही सभा यह गुप्त क्रांतिकारी दल की।&lt;br /&gt;ये सभी क्रांति के माने हुए सितारे हैं,&lt;br /&gt;सब आग लिए अपने-अपने अन्तस्तल की।&lt;br /&gt;इनकी बातें मेरे कानों में भी आईं,&lt;br /&gt;ये दिखे मुझे सब के सब प्राणों के दानी।&lt;br /&gt;आजाद उपस्थित हुआ नहीं, पर निर्विरोध,&lt;br /&gt;वह चुना गया था इस सेना का सेनानी।&lt;br /&gt;उसके प्रति यह निष्ठा, ऐसा विश्वास अडिग,&lt;br /&gt;यह मुझे हर्ष की और गर्व की बात बनी।&lt;br /&gt;उस सेनानी ने दल में नई जान डाली,&lt;br /&gt;फिर जोर-शोर से अँग्रजों से जंग ठनी।&lt;br /&gt;यह नया पृष्ठ, यह नया चित्र, देखें इसको,&lt;br /&gt;आजाद-भगत, ये गुप्त मन्त्रणा में रत हैं।&lt;br /&gt;इतने स्नेहिल, भाई-भाई से अधिक प्रेम,&lt;br /&gt;जो असंभाव्य, ये उसको करने उद्यत हैं।&lt;br /&gt;इनकी बातों का यह रहस्य था मिला मुझे,&lt;br /&gt;इनको असेम्बली में करनी थी बमबारी।&lt;br /&gt;शासन के बहरे कान खोलने थे उनको,&lt;br /&gt;आजाद, व्यवस्था उसने ही की थी सारी।&lt;br /&gt;वह जाने कितनी बार सभा में हो आया,&lt;br /&gt;की जाँच, स्वयं उसने सब कुछ देखा-भाला।&lt;br /&gt;जब हुआ उसे सन्तोष, योजना सक्रिय थी,&lt;br /&gt;केवल न सभा, उसने साम्राज्य हिला डाला।&lt;br /&gt;जैसे ये देखे, वैसे चित्र अनेकों हैं,&lt;br /&gt;इनकी मस्ती के कई रूप हैं, रंग कई।&lt;br /&gt;आजाद, झलक मिलती है उसकी कई जगह,&lt;br /&gt;चित्रित उससे जीवन के यहाँ प्रसंग कई।&lt;br /&gt;निर्द्वंन्द्व घूमता था वह मुक्त-पवन जैसा,&lt;br /&gt;वह मन की गति जैसा ही था आता-जाता।&lt;br /&gt;व्यक्तित्व शीत-ज्वर जैसा ही था कुछ उसका,&lt;br /&gt;कँप-कँपी छूटती, शासन उससे थर्राता।&lt;br /&gt;जिसको पढ़-पढ़ कर लोग वीर बनते जाते,&lt;br /&gt;आजाद, वीरता की वह जीवित परिभाषा।&lt;br /&gt;भारत-माता का, वह साकार सुखद सपना,&lt;br /&gt;उसके अन्तर की वह सबसे उज्ज्वल आशा।&lt;br /&gt;--०००--&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12232924-113077629027872948?l=aazadsaral.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aazadsaral.blogspot.com/feeds/113077629027872948/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=12232924&amp;postID=113077629027872948' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/113077629027872948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/113077629027872948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aazadsaral.blogspot.com/2005/10/1516171819202122.html' title='चन्द्रशेखर आजाद-15,16,17,18,19,20,21,22'/><author><name>डॉ॰ व्योम</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10667912738409199754</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='07918652778961711634'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-12232924.post-113077524944333534</id><published>2005-10-31T08:10:00.000-08:00</published><updated>2005-10-31T08:14:09.466-08:00</updated><title type='text'>चन्द्रशेखर आजाद-23, 24, 25, 26</title><content type='html'>महाकाव्य&lt;br /&gt;चन्द्रशेखर आजाद&lt;br /&gt;-रचनाकार&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण सरल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाग- 23&lt;br /&gt;प्रयाग&lt;br /&gt;बोलते-फूल&lt;br /&gt;मैं हूँ प्रयाग, जीवन पुण्यों का पुष्पित तरु,&lt;br /&gt;मैं कठिन तपस्या का अभिलषित प्राप्त वर हूँ।&lt;br /&gt;मैं ज्ञान-कर्म-इच्छा का शुभ्र मिलन-मन्दिर,&lt;br /&gt;भारत की संस्कृतियों की रखे धरोहर हूँ।&lt;br /&gt;माँ वाणी की पूजा का मैं पावन प्रसाद,&lt;br /&gt;मैं अगरु, धूप-चन्दन का धूम्र सुगंधित हूँ।&lt;br /&gt;मैं सत्यं-शिवम्-सुन्दरम् का साकार रूप,&lt;br /&gt;मैं तीर्थराज के गौरव से अभिवन्दित हूँ।&lt;br /&gt;साहित्य-कला-संस्कृति की पुण्य-त्रिवेणी मैं,&lt;br /&gt;मैं जीवन के पावन प्रवाह का शुभ-संगम।&lt;br /&gt;मैं वेद-पुराणों-इतिहासों का मुखरित स्वर,&lt;br /&gt;मैंने उनके उपदेश किए हैं हृदयंगम।&lt;br /&gt;मैं हूँ यथार्थ-आदर्श और सिद्धान्त रूप,&lt;br /&gt;मैं गंगा-यमुना-सरस्वती का हूँ प्रवाह,&lt;br /&gt;सागर की गहराई तो नापी जा सकती,&lt;br /&gt;मेरे अन्तर की गहराई युग-युग अथाह।&lt;br /&gt;यह नहीं कि केवल गंगा, युमना, सरस्वती,&lt;br /&gt;मेरे आँगन में हिल-मिल कर लहराती हैं।&lt;br /&gt;जीवन की जाने कितनी विषम विविधतायें,&lt;br /&gt;सब मेरे घर आपस में मिलने आती हैं।&lt;br /&gt;मेरी धारा का पुण्य-परस इतना पावन,&lt;br /&gt;छू देते ही अस्थियाँ फूल बन जाती हैं।&lt;br /&gt;प्रतिकूल हवाएँ आकर यहाँ गले मिलतीं,&lt;br /&gt;बह पाने के भावों में वे सन जाती हैं।&lt;br /&gt;मैं कभी रात्रि के सन्नाटे में सुनता हूँ,&lt;br /&gt;तल में, वे सोए हुए फूल बतराते है,&lt;br /&gt;वे कौन, कहाँ से आए, क्या-क्या करते थे,&lt;br /&gt;ये सब बातें, वे सुनते और सुनाते हैं।&lt;br /&gt;कोई कहता, थी लाख-करोड़ों की सम्पत्ति,&lt;br /&gt;जब आया मैं, तो सभी छोड़कर आया हूँ।&lt;br /&gt;कोई कहता दुनिया बिलकुल निस्सार दिखी,&lt;br /&gt;मैं उस जग से सम्बन्ध तोड़कर आया हूँ।&lt;br /&gt;किसनू कहता, मैं बाग-बगीचे खेत-खले,&lt;br /&gt;अपने बेटे के नाम लिखा कर आया हूँ।&lt;br /&gt;साहू कहता, जो कुछ था-सब धरती में था,&lt;br /&gt;क्या छिपा कहाँ, मैं सभी दिखाकर आया हूँ।&lt;br /&gt;यह धनीराम का कथन कि घर के आँगन में,&lt;br /&gt;रुपयों के बादल आकर रोज बरसते थे।&lt;br /&gt;विश्वास छोड़ दीनू कहता, मेरे बच्चे,&lt;br /&gt;भूखे रहकर टुकड़ों के लिए तरसते थे।&lt;br /&gt;पुनिया कहती, मैं आई तो आते-आते,&lt;br /&gt;मैंने अपनी मुनिया का ब्याह रचाया था।&lt;br /&gt;कर दिए हाथ पीले, मैं रिण से उरिण हुई,&lt;br /&gt;बड़भागिन ने इन्दर जैसा वर पाया था।&lt;br /&gt;पारो कहती, वे मेरे सिरहाने ही थे,&lt;br /&gt;हौले से मेरा माथा तनिक हिलाया था।&lt;br /&gt;पा सुखद परस, मैंने आँखें खोलीं, उनने,&lt;br /&gt;रोते-रोते गंगाजल मुझे पिलाया था।&lt;br /&gt;टूटे से स्वर में मैं इतना कह सकी, नाथ!&lt;br /&gt;मैं बड़भागिन हूँ, बनी सुहागिन जाती हूँ।&lt;br /&gt;मेरे बच्चों को सदा सुखी रखना प्रियतम!&lt;br /&gt;तुम सुखी रहो, मैं भी यह दुआ मनाती हूँ।&lt;br /&gt;सुखिया कहती, मैं जीवन भर की दुखियारी,&lt;br /&gt;सुख मिला कभी, वह एक नाम का ही सुख था।&lt;br /&gt;हाँ एक और सुख था, वह सचमुच ही सुख था,&lt;br /&gt;वह मेरे वीर-बहादुर बेटे का मुख था।&lt;br /&gt;जब चलता वह, तो जैसे धरती हिलती थी,&lt;br /&gt;मेरे बेटे की गज भर चौड़ी छाती थी।&lt;br /&gt;सम्पदा सिमट मेरे घर आँगन में आती,&lt;br /&gt;मैं उसे देख लेती, निहाल हो जाती थी।&lt;br /&gt;ज्ञानी जी, अपनी ज्ञान भरी बातें करते,&lt;br /&gt;दुनिया क्या है छल है, प्रपंच है, माया है।&lt;br /&gt;हम मुट्ठी बाँधे गए और खोले आए,&lt;br /&gt;फूटी कौड़ी भी कोई साथ न लाया है।&lt;br /&gt;जग में धन-दौलत सुत-दारा हैं सभी व्यर्थ,&lt;br /&gt;मन को न शांति क्षण भर इनसे मिल पाई है।&lt;br /&gt;है धर्म और धरती की सेवा कर्म जिन्हें,&lt;br /&gt;वह सेवा उनकी सबसे बड़ी कमाई है।&lt;br /&gt;इस भाँति स्तब्ध-सन्नाटे में, मैं उन सबकी,&lt;br /&gt;सुनता रहता हूँ सुख-दुख की अगणित बातें।&lt;br /&gt;कुछ पता नहीं चलता, कितना क्या समय गया,&lt;br /&gt;इस तरह बीतती जाती है अगणित रातें।&lt;br /&gt;हाँ, इन बातों से परे और भी बातें हैं,&lt;br /&gt;जिनको मैं अपनी आँखों-देखी कह सकता।&lt;br /&gt;मैं भूल नहीं पाता कुछ मस्तानी छवियाँ,&lt;br /&gt;सुधियों में उनको देखे बिना न रह सकता।&lt;br /&gt;साहित्य-कला-विज्ञान आदि के वैसे तो,&lt;br /&gt;उद्भट ज्ञाता, विद्वान धुरन्दर रहे कई।&lt;br /&gt;कुछ राजनीति के कुशल खिलाड़ी भी खेले,&lt;br /&gt;कल्पना-तरंगों में भी डूबे-बहे कई।&lt;br /&gt;पर जिसने अपनी छाप बहुत गहरी छोड़ी,&lt;br /&gt;वह एक युवक, जैसे जलता अंगारा था।&lt;br /&gt;छबि कभी-कभी वह मुझे देखने को मिलती,&lt;br /&gt;मुझको उसका व्यक्तित्व बहुत ही प्यारा था।&lt;br /&gt;आजाद नाम से वह सब में जाना जाता,&lt;br /&gt;अँग्रेजों से तकरार वीर ने ठानी थी।&lt;br /&gt;भारत-माता के बन्धन देख न पाता वह,&lt;br /&gt;इसलिए भभक उट्ठी वह नई जवानी थी।&lt;br /&gt;उसने अपने जैसे ही दीवानों का दल,&lt;br /&gt;तैयार कर लिया था मरने मिट जाने को।&lt;br /&gt;अपना जीवन रख दिया मौत के घर गिरवी,&lt;br /&gt;भिड़ गया देश अपना आजाद कराने को।&lt;br /&gt;वैसे उपाधियों के चश्मे से देखें तो,&lt;br /&gt;व्यक्तित्व बहुत ही धुँधला उसका दिखता था।&lt;br /&gt;व्यक्तित्व वीरता के चश्मे से पढ़ें अगर,&lt;br /&gt;हम देखेंगे, वह रक्त-लेख ही लिखता था।&lt;br /&gt;उल्टे-सीधे जो अक्षर उसने सीखे थे,&lt;br /&gt;वे देश-भक्ति के गौरव-ग्रन्थ बने सारे।&lt;br /&gt;जो दुर्बलता का हृदय वेध रख देते हैं,&lt;br /&gt;उस भाषा के सब अक्षर ऐसे अनियारे।&lt;br /&gt;उस अमर-वीर की आत्माहुति का स्वर्ण-लेख,&lt;br /&gt;लिखने के पहले धैर्य जुटाना ही होगा।&lt;br /&gt;अपनी साँसों पर लदा बोझ हल्का करने,&lt;br /&gt;आँसू का अपना कोश लुटाना ही होगा।&lt;br /&gt;--०००--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाग-24&lt;br /&gt;आत्म-बलिदान&lt;br /&gt;उस दिन उपवन में एक वृक्ष की डाली पर,&lt;br /&gt;शुक और सारिका बैठे गपशप करते थे।&lt;br /&gt;चर्चित होती थी आसमान की ऊँचाई,&lt;br /&gt;धरती की बातों पर वे कभी उतरते थे।&lt;br /&gt;शुक बोला, मेरी जैसी चोंच कहीं देखी?&lt;br /&gt;इतनी सुन्दर, कवि-जन देते हैं उपमाएँ।&lt;br /&gt;सारिका छेड़ बैठी, कवियों की कौन बात-&lt;br /&gt;चाहें तिनके को तीर सरीखा बतलाएँ।&lt;br /&gt;केवल सुन्दर मुख होने से क्या होता है,&lt;br /&gt;हों कर्म हमारे सुन्दर, तब सुन्दरता है।&lt;br /&gt;यदि नहीं आत्मा में उतनी ही सुन्दरता,&lt;br /&gt;तो तेज धूप-सा रूप सदैव अखरता है।&lt;br /&gt;शुक बोला, रूपसि जली-भुनी क्यों बैठी हो?&lt;br /&gt;कवि की वाणी से सुरभित सुमन निकलते हैं।&lt;br /&gt;सारिका तुनक बोली, कवियों की भली चली-&lt;br /&gt;लग जाय रूप की आँच, तुरन्त पिघलते हैं।&lt;br /&gt;अपमान जाति का हुआ देख, शुक खिसियाया,&lt;br /&gt;बोला, छोड़ो ये बातें, करें ज्ञान-चर्चा।&lt;br /&gt;थोड़ा मुस्का कर चुटकी भरी सारिका ने,&lt;br /&gt;क्यों लगी सूझने अब तुमको पूजा-अर्चा ?&lt;br /&gt;शुक और सारिका की यह चहक-चुहुलबाजी,&lt;br /&gt;ला नहीं सकी कोई आकर्षक रंग नया।&lt;br /&gt;दो युवक वृक्ष के नीचे आकर बैठ गए,&lt;br /&gt;हो गया उपस्थित बिल्कुल एक प्रसंग नया।&lt;br /&gt;सारिका सहम संकेतों के स्वर में बोली,&lt;br /&gt;उड़ चलें कहीं हम गपशप वहाँ लड़ाएँगे।&lt;br /&gt;शुक ने संकेत किया, बैठो क्यों डरती हो?&lt;br /&gt;वे हमें पकड़ कर खा थोड़े ही जाएँगे।&lt;br /&gt;सारिका तनिक झुँझलाई, धीरे से बोली-&lt;br /&gt;मेरी मानो, यह डाल छोड़कर उड़ जाएँ।&lt;br /&gt;कुछ नहीं ठिकाना इन मर्दों की चालों का,&lt;br /&gt;क्या पता, फाँस हमको पिंजड़े में लटकाएँ।&lt;br /&gt;इस मीठी चुटकी का रस लेकर शुक बोला,&lt;br /&gt;मर्दों पर क्यों तुम गुस्सा आज उतार रहीं?&lt;br /&gt;मिल गया कौन-सा गुरु, जिसने शिक्षा दी है,&lt;br /&gt;बढ़-बढ़ कर आज मनोविज्ञान बखार रहीं।&lt;br /&gt;सारिका डूबते-से स्वर में शुक से बोली-&lt;br /&gt;उड़ चलें कहीं हम, मेरा मन चिन्तातुर है।&lt;br /&gt;कुछ अशुभ बात होती दिखलाई देती है,&lt;br /&gt;कुछ आशंका से धड़क रहा मेरा उर है।&lt;br /&gt;शुक बोला, नारी हो तुम, यों ही डरती हो,&lt;br /&gt;शुभ और अशुभ की चिन्ता तुम्हें सताती है।&lt;br /&gt;आ जाय छींक तो शकुन-अपशकुन हो जाता,&lt;br /&gt;तिल भर चिन्ता को नारी ताड़ बताती है।&lt;br /&gt;कह उठी सारिका, प्राप्त मुझे वरदान एक,&lt;br /&gt;क्या आगम है, यह भान मुझे हो जाता है।&lt;br /&gt;यदि मँडराती हो मौत किसी के सर पर तो,&lt;br /&gt;उसका यथार्थ अनुमान मुझे हो जाता है।&lt;br /&gt;इन दो में से यह एक गठीला नौ-जवान,&lt;br /&gt;पड़ रही मौत की इसके सर पर छाया है।&lt;br /&gt;मैं सोच रही, इसका भवितव्य टले कैसे,&lt;br /&gt;इस अशुभ अनागत ने ही मुझे सताया है।&lt;br /&gt;शुक बोल उठा, यह भेद आज मैं समझा हूँ,&lt;br /&gt;क्यों शंका-आशंका से नारी मन डरता।&lt;br /&gt;अपनी चिन्ता से अधिक उसे अपनों की है,&lt;br /&gt;जग-जाहिर है नारी की पर-दुख-कातरता।&lt;br /&gt;भवितव्य उसे तुम साफ-साफ ही बतला दो,&lt;br /&gt;कह दो उससे, उठकर अन्यत्र चला जाए।&lt;br /&gt;जो व्यक्ति सगा बनता, वह कभी दगा करता,&lt;br /&gt;कह दो, वह अपनों द्वारा नहीं छला जाए।&lt;br /&gt;कोई सचेत कर सके उसे, इसके पहले-&lt;br /&gt;प्रारम्भ हुआ युवकों में बातों का क्रम था।&lt;br /&gt;यद्यपि चर्चा का विषय गूढ़ ही दिखता था,&lt;br /&gt;बातों में दिखता नहीं कहीं भी विभ्रम था।&lt;br /&gt;''सुखदेव राज! यह देश किधर जा रहा आज,&lt;br /&gt;इसकी गतिविधि कुछ नहीं समझ में आती है।&lt;br /&gt;हम मरें-मिटें, खप जायँ देश-हित-चिन्तन में,&lt;br /&gt;पर जनता तो जी भर आनन्द मनाती है।&lt;br /&gt;उसका मत है, इसका ठेका कुछ लोगों पर,&lt;br /&gt;इन कामों में क्यों अपनी जान फँसाएँ हम ?&lt;br /&gt;जीवन पाया है, खाएँ-पिएँ-करें मस्ती,&lt;br /&gt;यौवन पाया है, झूमें-नाचें-गाएँ हम।&lt;br /&gt;ये युवक कि जो भारत के भाग्य-विधाता है,&lt;br /&gt;ये चकाचौंध की धाराओं में बहते हैं।&lt;br /&gt;लेकर यौवन की आग माँगते ये पानी,&lt;br /&gt;ये जोर जुल्म सब शीश झुकाए सहते हैं।``&lt;br /&gt;सुखदेवराज बोला, "भैया आजाद! सुनो,&lt;br /&gt;हम इनकी गति को मोड़ें तो कैसे मोड़ें।&lt;br /&gt;इनसे कुछ आशा करना, बड़ी दुराशा है,&lt;br /&gt;इसलिए उचित है, हम इनका पीछा छोड़ें।"&lt;br /&gt;"मैं इससे सहमत नहीं, राज! जो तुम कहते,&lt;br /&gt;हम नई आग इन युवकों में भड़काएँगे।&lt;br /&gt;ये उठें, प्रलय के ताण्डव का उद्घोष करें,&lt;br /&gt;ये उठें, भाग्य इस धरती का चमाकाएँगे।&lt;br /&gt;यदि किसी देश की दौलत का अनुमान करें,&lt;br /&gt;संकल्पवान यौवन केवल उसका धन है।&lt;br /&gt;हैं युवक, उठाते राष्ट्र-भार जो कंधों पर,&lt;br /&gt;युवकों से मिलता सदा राष्ट्र को जीवन है।&lt;br /&gt;यदि युवक हुए पथ-भ्रष्ट पतन की क्या सीमा,&lt;br /&gt;ये डूब गए, तो देश रसातल जाता है।&lt;br /&gt;ये उछले, इनके बल पर देश उछलता है,&lt;br /&gt;धरती पर जैसे स्वर्ग उतर कर आता है।&lt;br /&gt;इसलिए करेंगे हम सचेत इस पीढ़ी को,&lt;br /&gt;हम युवकों को करना बलिदान सिखाएँगे।&lt;br /&gt;ये सोए तो दुर्भाग्य हमारा जागेगा,&lt;br /&gt;हम छिड़क खून के छींटे इन्हें जगाएँगे।&lt;br /&gt;इस ओर खून की बात न हो पाई पूरी,&lt;br /&gt;उस ओर खून के बादल सचमुच घिर आए।&lt;br /&gt;सुखदेवराज कब खिसका, पता न चल पाया,&lt;br /&gt;आजाद अकेले पर वे बादल अर्राए।&lt;br /&gt;'तुम कौन?` कड़क कर पूछा पुलिस अधीक्षक ने,&lt;br /&gt;जब सुनी नॉट बाबर के मुख से यह बोली-&lt;br /&gt;आजाद, भला यह सुनने का कब आदी था,&lt;br /&gt;उस बोली पर वह दाग उठा सीधी गोली।&lt;br /&gt;वह गोली उसकी, शत्रु भुजा को ले बैठी,&lt;br /&gt;ऐसा अचूक उसका वह सधा निशाना था।&lt;br /&gt;यह लगा नॉट बाबर को कहाँ उलझ बैठे,&lt;br /&gt;आ गया काल ही सम्मुख, उसने जाना था।&lt;br /&gt;दूसरी ओर विश्वेश्वर लिए मोर्चा था,&lt;br /&gt;कुछ उझक, वीर पर उसने भी गोली छोड़ी।&lt;br /&gt;आजाद, लगाया उसने नहले पर दहला,&lt;br /&gt;अपनी गोली से उसकी भी हड्डी तोड़ी।&lt;br /&gt;कर दिया कचूमर जबड़े का उस गोली ने,&lt;br /&gt;विश्वेश्वर पीछे हट झाड़ी में दुबक गया।&lt;br /&gt;इस ओर डटा आजाद अकेला एक वीर,&lt;br /&gt;उस ओर सैन्य-दल दुश्मन का आ गया नया।&lt;br /&gt;वह गरज-गरज कहता गोरी सेना लाओ,&lt;br /&gt;क्यों मेरे सम्मुख लाए तुम हिन्दुस्तानी ?&lt;br /&gt;देखो, नस-नस में गर्म खौलता खून भरा,&lt;br /&gt;तुम समझ रहे शायद इनमें होगा पानी।&lt;br /&gt;इस भाँति गर्जना कर वह छोड़ रहा गोली,&lt;br /&gt;पिस्तौल, आग की बौछारें थी बरसाती।&lt;br /&gt;जिस ओर छूटती गोली, सन्नाटा छाता,&lt;br /&gt;जिस ओर हाथ उठता, काई-सी फट जाती।&lt;br /&gt;दुर्भाग्य, एक ही तीर बच रहा तर्कश में,&lt;br /&gt;उस काल-मुखी में बची एक अन्तिम गोली।&lt;br /&gt;पिस्तौल लगा माथे से घोड़ा दबा दिया,&lt;br /&gt;वह खेल गया अपने से ही खूनी होली।&lt;br /&gt;बन पड़ी सैन्य-दल की, छोड़ीं गोलियाँ कई,&lt;br /&gt;देखी न पीठ, उनने छाती को भून दिया।&lt;br /&gt;जब-जब बन्दूकों ने छाती को गोली दी,&lt;br /&gt;तब-तब छाती ने क्रुद्ध उबलता खून दिया।&lt;br /&gt;जो खटक रहे अब तक अभाव थे जीवन के,&lt;br /&gt;हो गई पूर्ति उनकी, ऐसी घड़ियाँ आईं।&lt;br /&gt;मुख रहा तरसता गोली खाने बचपन में,&lt;br /&gt;गोलियाँ कई यौवन की छाती ने खाइंर्।&lt;br /&gt;भारत माता का लाल विदा लेकर उससे,&lt;br /&gt;जा मिला शहीदों की मस्तानी टोली में।&lt;br /&gt;जिसकी बोली लोगों को नवजीवन देती,&lt;br /&gt;थी छिपी मौत उसकी हर क्रोधित गोली में।&lt;br /&gt;पुँछ गया देश के माथे का वह रक्त-तिलक,&lt;br /&gt;निर्धनता की कुटिया ने जिसे लगाया था।&lt;br /&gt;हो गया शान्त घन-गर्जन जैसा स्वर, जिसने,&lt;br /&gt;भारत के गौरव को झकझोर जगाया था।&lt;br /&gt;वह लाल विदा हो गया बावली उस माँ का,&lt;br /&gt;साँसों के झूले पर जो उसे झुलाती थी।&lt;br /&gt;रखती जिसको पलकों की शीतल छाया में,&lt;br /&gt;थपकी दे-दे, छाती पर जिसे सुलाती थी।&lt;br /&gt;रह गई बिलखती-रोती वह दुखियारी माँ,&lt;br /&gt;वह उसकी गोदी सूनी करके चला गया।&lt;br /&gt;अपने हाथों से अपना जीवन-दीप बुझा,&lt;br /&gt;जन-जाग्रति की बुझती मशाल वह जला गया।&lt;br /&gt;सो गया मौत की गोदी में वह प्रलय-वीर,&lt;br /&gt;वह मौत नहीं, वह तो जीवन का अलंकरण।&lt;br /&gt;चलता था जीवन रखे हथेली पर जैसे,&lt;br /&gt;कर लिया मौत का भी वैसे ही स्वयं वरण।&lt;br /&gt;जो माँगा था वरदान मौत का, भर पाया,&lt;br /&gt;वह मौत नहीं, शाश्वत जीवन ही उसे मिला।&lt;br /&gt;अपनी धरती को खून पिला कर ही माना,&lt;br /&gt;था रक्त-सरोवर में गौरव का कमल खिला।&lt;br /&gt;जिसको कोई कायरता लाँघ नहीं पाए-&lt;br /&gt;वह मौत, खून की ऐसी अमिट रेख-सी है।&lt;br /&gt;हम जिसे मौत कहते, वह उसकी मौत नहीं,&lt;br /&gt;सदियों की छाती पर वह शिला-लेख सी है।&lt;br /&gt;कह रही मौत वह, चीख-चीख कर यह हमसे,&lt;br /&gt;हम जिएँ देश-हित, और देश के लिए मरें।&lt;br /&gt;भारत-माता जब हमसे यह जीवन माँगे,&lt;br /&gt;हँसते-हँसते यह जीवन अर्पित उसे करें।&lt;br /&gt;प्रेरणा शहीदों से हम अगर नहीं लेंगे,&lt;br /&gt;आजादी ढलती हुई साँझ हो जाएगी।&lt;br /&gt;यदि वीरों की पूजा हम नहीं करेंगे तो&lt;br /&gt;यह सच मानो, वीरता बाँझ हो जाएगी।&lt;br /&gt;--०००--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाग-25&lt;br /&gt;पथिक&lt;br /&gt;प्रतिबोध&lt;br /&gt;मैं आजादी के परवानों का दीवाना,&lt;br /&gt;मैं आजादी की डगर-डगर में घूमा हूँ।&lt;br /&gt;आजाद चन्द्रशेखर की है जो याद लिए,&lt;br /&gt;उस ग्राम-ग्राम में, नगर-नगर में घूमा हूँ।&lt;br /&gt;कंकड़-पत्थर, गलियों-चौराहों को मैंने,&lt;br /&gt;उस महाबली की याद सँजोते देखा है।&lt;br /&gt;जिनसे उसके जीवन की गाथा जुड़ी हुई,&lt;br /&gt;उन वृक्षों को भी मैंने रोते देखा है।&lt;br /&gt;वह कुटिया, जिसमें उसने प्रथम साँस ली थी,&lt;br /&gt;कहती, मुझको बेटे की आहट आती है।&lt;br /&gt;वे चट्टानें, जिन पर वह खेला-कूदा था,&lt;br /&gt;उन चट्टानों की भी छाती फट जाती है।&lt;br /&gt;मेरे पैरों से लिपट धूल ने पूछा था&lt;br /&gt;जो मुझमें खेला, वह मेरा फौलाद कहाँ?&lt;br /&gt;हर मेंढ़, डगर, पगडण्डी ने भी प्रश्न किया,&lt;br /&gt;आजाद कहाँ? आजाद कहाँ? आजाद कहाँ?&lt;br /&gt;आजाद कहाँ, मैं इसका क्या उत्तर देता,&lt;br /&gt;में उनको रोते और बिलखते छोड़ चला।&lt;br /&gt;मैं घबराया, मेरा ही हृदय न फट जाए,&lt;br /&gt;उस ग्राम-धरा से मैं अपना मुख मोड़ चला।&lt;br /&gt;ओोरछा तीर्थ बन गया देश-भक्तों का जो,&lt;br /&gt;जा पहुँचा मैं भी वहाँ सांत्वना पाने को।&lt;br /&gt;क्या पता कि लेने के देने पड़ जायेंगे,&lt;br /&gt;मैं धैर्य कहाँ से लाऊँ, हाल सुनाने को।&lt;br /&gt;मेरे कन्धों से लग सातार बहुत रोई,&lt;br /&gt;आजाद कहाँ भैया? क्या सन्देशा लाए?&lt;br /&gt;सुध-बुध तो खोता नहीं भावरा याद किए,&lt;br /&gt;बतलाओ, तुम तो अभी वहीं से ही आए।&lt;br /&gt;``आजाद कहाँ? आजाद कहाँ?'' रटते-रटते,&lt;br /&gt;मैंने देखा सातार सूखती जाती थी।&lt;br /&gt;पानी होकर, वह दिल पत्थर कैसे करती,&lt;br /&gt;इसलिए पत्थरों से वह सर टकराती थी।&lt;br /&gt;उस कुटिया में जिसमें योगी आजाद रहा,&lt;br /&gt;उस नर नाहर की वीर-प्रसू माँ आई थी।&lt;br /&gt;उसका क्रन्दन सुन पत्थर पिघल हुए पानी,&lt;br /&gt;फट गए हृदय, उसने पछाड़ जब खाई थी।&lt;br /&gt;दीवारों से सर फोड़-फोड़ उसने पूछा-&lt;br /&gt;``क्यों खड़ी मौन? बतलाओ मेरा लाल कहाँ?&lt;br /&gt;साम्राज्यवाद की पर्वत जैसी छाती भी,&lt;br /&gt;धक-धक करने लगती थी, वह भूचाल कहाँ?&lt;br /&gt;ओ सरिता की वाचाल लहरियों! बोलो तो,&lt;br /&gt;मेरी आशाओं का मृग-छौना कहाँ गया?&lt;br /&gt;माँ होकर भी मैं स्वयं खेलती थी जिससे,&lt;br /&gt;मेरा चन्दा, वह बाल-खिलौना कहाँ गया?&lt;br /&gt;अर्जुन वृक्षों! तुम रहे खड़े के खडे यहाँ,&lt;br /&gt;मेरी आँखों की ज्योति यहाँ से चली गई।&lt;br /&gt;मेरी गुदड़ी में एक लाल ही शेष बचा,&lt;br /&gt;कैसी अभागिनी, मैं उससे भी छली गई।&lt;br /&gt;मेरी छाती से लग कर जिसने दूध पिया,&lt;br /&gt;उस छाती से बोलो अब किसे लगाऊँ मैं?&lt;br /&gt;किसका माथा चूमूँ राजा-बेटा कहकर?&lt;br /&gt;अब कृष्ण-कन्हैया कहकर किसे जगाऊँ मैं?''&lt;br /&gt;जिस तरह किया माँ ने विलाप, उसकी गाथा,&lt;br /&gt;हर पत्ती ने रो-रोकर मुझे बताई थी।&lt;br /&gt;मैं खड़ा रह सका नहीं, वहाँ से खिसक गया,&lt;br /&gt;मुझको प्रयाग में ही अपना सुधि आई थी।&lt;br /&gt;वह उपवन भी मैंने जाकर देखा, जिसमें,&lt;br /&gt;आ गई मौत को भी उसने ललकारा था।&lt;br /&gt;जो वीर प्रसूता माँ का दूध पिया उसने,&lt;br /&gt;वह दूध, खून का बन बैठा फव्वारा था।&lt;br /&gt;उस उपवन का हर वृक्ष तड़पता दिखा मुझे,&lt;br /&gt;यह साख-साख ने फूट-फूट कर बतलाया।&lt;br /&gt;आजाद नाम, जो बना वीरता का प्रतीक,&lt;br /&gt;वह सुभट-सूरमा लड़कर यहीं काम आया।&lt;br /&gt;आ-आकर मुझमे कई हवाएँ कह जातीं,&lt;br /&gt;उस बलिदानी को लोग भूलते जाते हैं।&lt;br /&gt;जिन आँखों ने उसका लोहू बहते देखा,&lt;br /&gt;उन आँखों में पद-लोभ फूलते जाते हैं।&lt;br /&gt;कह देना उनसे एक बात यह समझा कर,&lt;br /&gt;जो याद शहीदों की इस तरह भुलाते हैं,&lt;br /&gt;दुश्मन उनकी आजादी को तकते रहते,&lt;br /&gt;जब दाँव लगा, तो वे उसको खा जाते हैं।&lt;br /&gt;कह देना, आजादी जीवित रखनी है तो,&lt;br /&gt;उन सब को पूजें, जिनने खून बहाया है।&lt;br /&gt;यह बिना खून की बूँद बहाए नहीं मिली,&lt;br /&gt;लोहू का भागीरथ यह गंगा लाया है।&lt;br /&gt;यह नहीं, याद भर ही उनकी हो अलम् हमें,&lt;br /&gt;अवसर आए प्राणों के पुष्प चढ़ाएँ हम।&lt;br /&gt;अब आजादी की बलिवेदी माँगे हविष्य,&lt;br /&gt;अपने हाथों से अपने शीष चढाएँ हम।&lt;br /&gt;कर्त्तव्य कह रहा चीख-चीख कर यह हमसे,&lt;br /&gt;हर एक साँस को एक सबक यह याद रहे&lt;br /&gt;अपनी हस्ती क्या, रहें-रहें या नहीं रहें,&lt;br /&gt;यह देश रहे आबाद, देश आजाद रहे।&lt;br /&gt;--०००--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाग- 26&lt;br /&gt;उपसंहार&lt;br /&gt;युग-ध्वनि&lt;br /&gt;आजाद, महाभारत का भीषण शंखनाद,&lt;br /&gt;गूँजता सदा युद्धोन्माद का घोष रहा।&lt;br /&gt;उसकी साँसों ने देश-भक्ति के स्वर फूँके,&lt;br /&gt;जुल्मों के प्रति जलता उसका आक्रोश रहा।&lt;br /&gt;आजाद, भँवर वन बैठा जीवन-धारा का,&lt;br /&gt;वह कायरता के कलुष डुबाया करता था।&lt;br /&gt;वह जीवन का बैताल, सजग विक्रम करता,&lt;br /&gt;वह अनाचर में आग लगाया करता था।&lt;br /&gt;आजाद, भयंकर चक्रवात संकल्पों का,&lt;br /&gt;वह अन्यायों की धूल उड़ाया करता था।&lt;br /&gt;अत्याचारी व्यक्तित्वों को करने निढाल,&lt;br /&gt;उसका यौवन रस्सियाँ तुड़ाया करता था।&lt;br /&gt;आजाद, क्षुब्ध सागर का उठता हुआ ज्वार,&lt;br /&gt;थे शासन के जलपोत डगमगाया करते।&lt;br /&gt;उसकी प्रचण्डता का कोई प्रतिरोध न था,&lt;br /&gt;कानून, आग ही उसकी भड़काया करते।&lt;br /&gt;आजाद, हिमालय अडिग उच्च आदर्शों का,&lt;br /&gt;वीरता सदा उसकी अविजित ऊँचाई थी।&lt;br /&gt;भारत-माता के लिए काम आऊँगा मैं,&lt;br /&gt;यह गंगा उसने दोनों हाथ उठाई थी।&lt;br /&gt;आजाद, वीरता के तर्कश का क्रुद्ध तीर,&lt;br /&gt;निर्दिष्ट लक्ष्य का सदा अचूक निशाना था।&lt;br /&gt;आजादी का अभिषेक रक्त से होता है,&lt;br /&gt;यह मर्म, धर्म जैसा उसने पहचाना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजाद, कड़कता हुआ क्रुद्ध वह घन था, जो,&lt;br /&gt;अरि पर खूनी बिजलियाँ गिराया करता था।&lt;br /&gt;वह मुर्दों में संचार खून का करता था,&lt;br /&gt;उनमें जीवन की ज्योति जगाया करता था।&lt;br /&gt;आजाद, भावनाओं का वह भूकम्प विकट,&lt;br /&gt;उस धक्के से साम्राज्यवाद थरथरा उठा।&lt;br /&gt;आजाद वज्र का था ऐसा आघात प्रबल,&lt;br /&gt;अत्याचारों का पर्वत भी चरमरा उठा।&lt;br /&gt;आजाद, फूटता हुआ भयंकर ज्वाला-गिरि,&lt;br /&gt;हम जिसे खून कहते, वह क्रोधित लावा था।&lt;br /&gt;वह दानव-सा दुर्दान्त दस्यु भी दहल गया,&lt;br /&gt;ऐसा भीषण उस महावीर का धावा था।&lt;br /&gt;आजाद, हिन्द के बलिदानों का स्वर्ण-लेख,&lt;br /&gt;जो गर्म खून से गौरव-लिपि में लिखा गया।&lt;br /&gt;भारत के बेटे आजादी के पर्वाने,&lt;br /&gt;यह सत्य, सूर्य जैसा चमका कर दिखा गया।&lt;br /&gt;आजाद, देश की आजादी का वह रहस्य,&lt;br /&gt;जिसने जाना, वह बना देश का दीवाना।&lt;br /&gt;जो जान न पाया, उस कृतघ्न का क्या कहना,&lt;br /&gt;है अर्थहीन उसका जग में आना-जाना।&lt;br /&gt;आजाद प्रेरणा-स्रोत अमर हर पीढ़ी का,&lt;br /&gt;धरती की आजादी प्राणों से प्यारी हो।&lt;br /&gt;यौवन अंगारों से अपना शृंगार करे,&lt;br /&gt;हर फूल वज्र, हर कली कराल कटारी हो।&lt;br /&gt;--०००--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-श्रीकृष्ण सरल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12232924-113077524944333534?l=aazadsaral.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aazadsaral.blogspot.com/feeds/113077524944333534/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=12232924&amp;postID=113077524944333534' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/113077524944333534'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/113077524944333534'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aazadsaral.blogspot.com/2005/10/23-24-25-26.html' title='चन्द्रशेखर आजाद-23, 24, 25, 26'/><author><name>डॉ॰ व्योम</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10667912738409199754</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='07918652778961711634'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-12232924.post-112981484318934027</id><published>2005-10-20T06:26:00.000-07:00</published><updated>2005-10-20T06:27:23.206-07:00</updated><title type='text'>आजाद महाकाव्य-   12,  13,  14</title><content type='html'>चन्द्रशेखर आजाद महाकाव्य&lt;br /&gt;-श्रीकृष्ण सरल&lt;br /&gt;सर्ग- 12. 13. 14&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[12]&lt;br /&gt;वर की खोज&lt;br /&gt;आजाद, गोद में मेरी ऐसे आ बैठा,&lt;br /&gt;सचमुच ही जैसे मैंने उसको गोद लिया।&lt;br /&gt;उसके प्रति इतना स्वाभाविक आकर्षण था,&lt;br /&gt;जैसे हठमठ ही उसने मेरा दूध पिया।&lt;br /&gt;अंग्रेजी शासन के मुँह पर थप्पड़ जड़कर,&lt;br /&gt;मेरी गोदी में आ बैठा निर्भीक-मना।&lt;br /&gt;जैसे घर में ऊँचाई पर हो चित्र टँगा,&lt;br /&gt;पंछी उसके पीछे ले अपना नीड़ बना।&lt;br /&gt;या जैसे कोई सिंह देख अपना शिकार,&lt;br /&gt;कुछ दुबक, संकुचित हो धरती से सट जाए।&lt;br /&gt;फिर अपनी पूरी शक्ति लगा भरकर उछाल,&lt;br /&gt;कसमसा तीर-सा छूटे, उसे झपट खाए।&lt;br /&gt;वैसे ही वह आजाद वीर वज्रांग बली,&lt;br /&gt;दम साधे था अपने दुश्मन पर फट पड़ने।&lt;br /&gt;कह रहा शक्ति का संचय था सक्रियता से,&lt;br /&gt;साम्राज्यवाद के दुर्दम दानव से लड़ने।&lt;br /&gt;अज्ञातवास ही केवल उसका लक्ष्य न था,&lt;br /&gt;वह सूत्र क्रांति के धीरे-धीरे जोड़ रहा।&lt;br /&gt;यौवन, जो होता चकाचौंध पर न्योछावर,&lt;br /&gt;संघर्षों के पथ पर वह उसको मोड़ रहा।&lt;br /&gt;उर्वरा भूमि में यत्न-लता लहलहा उठी,&lt;br /&gt;कलियों ने आँखें खोली, श्रम ने फल पाए।&lt;br /&gt;आजाद अकेला नहीं शत्रु के सम्मुख था,&lt;br /&gt;विश्वस्त मित्र थे अब उसके दाँए-बाँए।&lt;br /&gt;यौवन की आँधीं उठी वेग से हहराती,&lt;br /&gt;लड़खड़ा उठी अत्याचारों की सजल घटा।&lt;br /&gt;आराध्य देश, व्यक्तित्व श्लेष था उन सबका,&lt;br /&gt;संकल्प-साधना अनुप्रास की दिव्य छटा।&lt;br /&gt;जब सुखद नींव की घनी छाँह में, लोगों के,&lt;br /&gt;यौवन के मीठे मादक सपने पलते थे।&lt;br /&gt;कर्तव्य-सजग उनके अंतर भट्टी बनते,&lt;br /&gt;संकल्प मुक्ति के, गोले जैसे ढलते थे।&lt;br /&gt;संकल्प अकेले ढलते, ऐसी बात न थी,&lt;br /&gt;निर्मित होते सचमुच विध्वंसक बम गोले।&lt;br /&gt;था बारूदी उत्साह भड़क उठने आतुर,&lt;br /&gt;सब तुले हुऐ थे, जो होना है सो होले।&lt;br /&gt;हम भूख-प्यास जिस आवश्यकता को कहते,&lt;br /&gt;उस दुर्बलता के आगे थे वे झुके नहीं।&lt;br /&gt;उठ गए पाँव, तूफान ताकता रहा उन्हें,&lt;br /&gt;वे आग और पानी से बाधित रुके नहीं।&lt;br /&gt;क्या वास्तु विवशता है, उनने जाना न कभी,&lt;br /&gt;भय क्या है उससे परिचय भी तो हुआ नहीं।&lt;br /&gt;घर की सीमाओं ने उनको बाँधा न कभी,&lt;br /&gt;अपनों की ममता ने उनका मन छुआ नहीं।&lt;br /&gt;आजाद, देश की आजादी था खोज रहा,&lt;br /&gt;संघर्ष-शील मन के संकल्पों के वन में।&lt;br /&gt;हर साँस दासता से भारी-भारी लगती,&lt;br /&gt;कस रही खाल थी उसकी, माँ के बंधन में।&lt;br /&gt;भुजदंड फड़कते थे अरि का मर्दन करने,&lt;br /&gt;वह दाँत पीसता था उसको खा जाने को।&lt;br /&gt;उसका यौवन था प्रलय मेघ-सा घुमड़ रहा,&lt;br /&gt;धरती के दुश्मन पर विनाश बरसाने को।&lt;br /&gt;था सूँघ रहा शासन भी उसकी गतिविधियाँ,&lt;br /&gt;वह डाल रहा था जाल, उसे उलझाने को।&lt;br /&gt;बढ़ रहीं समस्याएँ थीं उसकी दिन-दूनी,&lt;br /&gt;आजाद चाहिए था उनको सुलझाने को।&lt;br /&gt;हथकड़ियाँ थीं बेचैन वरण करने उसका,&lt;br /&gt;वे आस लगाए उसकी बैठी थीं क्वाँरी।&lt;br /&gt;ससुराल बने, यह कारागृह की साध रही।&lt;br /&gt;कर रहे सभी थे धूमधाम से तैयारी।&lt;br /&gt;बढ़ रहे भाव, आजाद अकड़ता जाता था,&lt;br /&gt;था माँग रहा यह भी दहेज में आजादी।&lt;br /&gt;शासन ससुरा, यह देने को तैयार न था,&lt;br /&gt;इस उलझन में थी अटक रही अब तक शादी।&lt;br /&gt;जब देखा, उसको सभी दबाने तुले हुए,&lt;br /&gt;सब उसे फाँसने डाल रहे घेरा भारी।&lt;br /&gt;तो वह भी सबको धता बताकर निकल गया,&lt;br /&gt;रम गया कहीं वह, बनकर बालब्रह्मचारी।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[13]&lt;br /&gt;ओरछा&lt;br /&gt;अज्ञात योगी&lt;br /&gt;ओरछा नाम, मैंने भी जीवन देखा,&lt;br /&gt;मैं ग्राम-नगर दोनों की सीमा-रेखा।&lt;br /&gt;खण्डहर, बीते वैभव की याद दिलाते,&lt;br /&gt;अब लहाराते हैं खेत गाँव के नाते।&lt;br /&gt;खण्डहर जिनमें साहित्य दबा सोता है,&lt;br /&gt;उसकी साँसों का भास मुझे होता है।&lt;br /&gt;लगता है, जैसे केशव बोल रहे हैं,&lt;br /&gt;कानों में जैसे मधुरस घोल रहे हैं।&lt;br /&gt;लगता है, जैसे इन्द्र-सभा मुखरित है,&lt;br /&gt;लगता है, जैसे राज प्रजा का हित है।&lt;br /&gt;लगता है, जैसे हर घर कला-निकेतन,&lt;br /&gt;लगता, जैसे रस-सराबोर जड़-चेतन।&lt;br /&gt;स्वर के झूलों पर राग झूलता दिखता,&lt;br /&gt;गौरव से है हर वृक्ष फूलता दिखता।&lt;br /&gt;कुछ छायाएँ, जैसे हिलती-डुलती हैं,&lt;br /&gt;जैसे वे आपस में मिलती-जुलती हैं।&lt;br /&gt;प्रेरणा यहाँ है प्राणवन्त कण-कण में,&lt;br /&gt;युग के युग जैसे समा रहे हर क्षण में।&lt;br /&gt;बीते वैभव की याद गर्व बनती है,&lt;br /&gt;वह वर्तमान को पुण्य-पर्व बनती है।&lt;br /&gt;चढ़ रही धूल यश पर यद्यपि विस्मृति की,&lt;br /&gt;पर है विचित्र कुछ चाल समय की गति की।&lt;br /&gt;कोई झोंका आता है धूल उड़ाता,&lt;br /&gt;वह मेरे गौरव को फिर से चमकाता।&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले ही ऐसा झोंका आया,&lt;br /&gt;वह मुझको बिलकुल नई चेतना लाया।&lt;br /&gt;वह पवन झकोरा मनुज-देह-धारी था,&lt;br /&gt;वह कोई पहुँचा हुआ ब्रह्मचारी था।&lt;br /&gt;पूछा,तो बोला नाम हरीशंकर है,&lt;br /&gt;जीवन बिलकुल आजाद, देश ही घर है,&lt;br /&gt;जिस जगह लगा मन, योगी रम जाता है।&lt;br /&gt;जीवन-प्रवाह कुछ दिन को थम जाता है।&lt;br /&gt;उस योगी में कुछ कांति विलक्षण देखी,&lt;br /&gt;अव्यक्त साधना उसमें हर क्षण देखी।&lt;br /&gt;तन ऐसा, जैसे पैरुष देह धरे हो,&lt;br /&gt;मन ऐसा, जैसे पूरा सिंधु भरे हो।&lt;br /&gt;मुख पर ज्वलन्त जैसे संकल्प लिपे हों,&lt;br /&gt;वाणी में जैसे अगणित भेद छिप हों।&lt;br /&gt;आँखों में जैसे कोई लौ जलती हो,&lt;br /&gt;संसृति, जैसे संकेतों पर चलती हो।&lt;br /&gt;योगी की कुटिया थी सातार किनारे,&lt;br /&gt;हो सिद्धि खड़ी जैसे साधन के द्वारे।&lt;br /&gt;फलवती हुई हो जैसे कठिन तपस्या,&lt;br /&gt;या लिए चुनौती कोई जटिल समस्या।&lt;br /&gt;सातार, कि जैसे इच्छा मचल रही हो,&lt;br /&gt;`चाँदी' जैसे आतप से पिघल रही हो।&lt;br /&gt;चलती, तो चट्टानों से टकराती थी,&lt;br /&gt;वह उछल-उछल संघर्ष गीत गाती थी।&lt;br /&gt;कहती हो जैसे, जीवन केवल गति है,&lt;br /&gt;गतिशील समय, गतिशील स्वयं संसृति है।&lt;br /&gt;यदि बैठ गए थक कर, जीवन की यति है,&lt;br /&gt;जीवन की यति, बस दुर्गति ही दुर्गति है।&lt;br /&gt;वह कुटिया भी उसकी हाँ में हाँ भरती,&lt;br /&gt;संघर्ष निरन्तर क्रुद्ध पवन से करती।&lt;br /&gt;जर्जरित पात झोंकों से उड़ जाते थे,&lt;br /&gt;योगी के श्रम से वे फिर जुड़ जाते थे।&lt;br /&gt;वर्षा आती, तो छाजन रोक न पाता,&lt;br /&gt;योगी कोने में सिमटा रात बिताता।&lt;br /&gt;था शिशिर-समीरण, जैसे तीर चलाता,&lt;br /&gt;हड्डी-हड्डी को भेद प्राण छू जाता।&lt;br /&gt;कोई योगी को विचलित कर न सका था,&lt;br /&gt;डर उसे डराता, पर वह डर न सका था।&lt;br /&gt;अर्जुन-वृक्षों पर झुकता घना अंधेरा,&lt;br /&gt;भूतों-प्रेतों का जैसे उन पर डेरा।&lt;br /&gt;हर रात विकट भय की सराय होती थी,&lt;br /&gt;जंगली हवा की साँय-साँय होती थी।&lt;br /&gt;बाहर हू! हू! करके शृगाल रोते थे,&lt;br /&gt;अच्छे-अच्छे अपना धीरज खोते थे।&lt;br /&gt;थे कभी भयानक वन पशु शोर मचाते,&lt;br /&gt;दरवाजे पर ही सिंह कभी आ जाते।&lt;br /&gt;योगी, जैसे भय का दुर्भेद्य किला था,&lt;br /&gt;पर्वत जैसा अविचल मन उसे मिला था।&lt;br /&gt;श्रम उसके जीवन का अति पावन क्रम था,&lt;br /&gt;बजरंग बली की पूजा नित्य-नियम था।&lt;br /&gt;सिंदूरी चोला उन्हें चढ़ाया करता,&lt;br /&gt;कुछ इधर-उधर भी वह हो आया करता।&lt;br /&gt;जा रहा एक दिन था वह वन-प्रांतर में,&lt;br /&gt;थे घुमड़ रहे कुछ भाव सजग अन्तर में।&lt;br /&gt;आ निकट, पुलिस वालों ने उसको घेरा,&lt;br /&gt;`सच-सच बतला क्या असल नाम है तेरा?&lt;br /&gt;लगता, तू ही आजाद क्रांन्तिकारी है,&lt;br /&gt;यह भेष बदल कर बना ब्रह्मचारी है।&lt;br /&gt;हम अभी साथ ले चलते तुमको थाने,&lt;br /&gt;सब आ जाएगी तेरी अकल ठिकाने।&lt;br /&gt;योगी बोला, ``क्यों तुम सब मुझे सताते,&lt;br /&gt;आजाद क्रांन्तिकारी क्यों मुझे बताते।&lt;br /&gt;वैसे मैं हूँ आजाद क्योंकि योगी हूँ,&lt;br /&gt;मैं नहीं किसी का चर वेतन-भोगी हूँ।&lt;br /&gt;जिसने घर छोड़ा, बना ब्रह्मचारी है,&lt;br /&gt;वह व्यक्ति कर्म से सदा क्रांन्तिकारी है।&lt;br /&gt;पर छोड़ो इन बातों को तुम घर जाओ,&lt;br /&gt;मैं हनूमान का भक्त, न मुझे सताओ।&lt;br /&gt;बजंरग बली को चोला मुझे चढ़ाना,&lt;br /&gt;जब जी चाहे, तुम भी प्रसाद ले जाना।&lt;br /&gt;योगी ने उनको भरमाया बातों में,&lt;br /&gt;क्या जीते उससे कोई प्रतिघातों में।&lt;br /&gt;उनको टरका, योगी कुटिया पर आया,&lt;br /&gt;निज इष्टदेव को आकर शीष नवाया।&lt;br /&gt;बोला, ``बंजरगी! खूब बचाया तूने,&lt;br /&gt;संकट में अच्छा मार्ग सुझाया तूने।&lt;br /&gt;पकड़ा जाता तो हवा जेल की खाता,&lt;br /&gt;सब किए कराए पर पानी फिर जाता।&lt;br /&gt;तेरे बल पर मैं हर दम यही कहूँगा,&lt;br /&gt;आजाद नाम, हरदम आजाद रहूँगा।&lt;br /&gt;पैदा न हुआ कोई, जो मुझको पकड़े,&lt;br /&gt;जंजीरों में मुझको क्या कोई जकड़े।&lt;br /&gt;यह पुलिस, स्वयं हारेगी और थकेगी,&lt;br /&gt;जीते जी, मेरी छाया छू न सकेगी।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[14]&lt;br /&gt;योग माया&lt;br /&gt;अनुदिन प्रसरित योगी की ख्याति-परिधि थी,&lt;br /&gt;बढ़ रही ब्याज जैसी ही यश की निधि थी।&lt;br /&gt;सौरभ को क्या कोई बन्दी कर पाया?&lt;br /&gt;क्या नहीं क्षितिज से सूरज बाहर आया?&lt;br /&gt;विश्वास जहाँ जमता, श्रद्धा बढ़ती है,&lt;br /&gt;वह तेज नशे जैसी मन पर चढ़ती है।&lt;br /&gt;यश की निधि लूटे कभी नहीं लुटती है,&lt;br /&gt;जितनी लूटो, वह दूनी आ जुटती है।&lt;br /&gt;जब कीर्ति-कौमुदी फैल गई घर-घर में,&lt;br /&gt;कुटिया का योगी था सबके अन्तर में।&lt;br /&gt;लग गए भक्त-जन अब दर्शन को आने,&lt;br /&gt;अर्पित करते थे लोग फूल, फल पाने।&lt;br /&gt;थी एक साँझ, वह बेला गोधूली थी,&lt;br /&gt;वन-प्रांतर में संध्या फूली-फूली थी।&lt;br /&gt;वरदान प्रकृति ने शोभा का पाया था,&lt;br /&gt;मन का हुलास, जैसे बाहर आया था।&lt;br /&gt;योगी यह मोहक दृश्य निहार रहा था,&lt;br /&gt;वह मन में उसका चित्र उतार रहा था।&lt;br /&gt;उसकी तन्मयता में कुछ बाधा आई,&lt;br /&gt;दी उसे मृदुल कोमल पदचाप सुनाई।&lt;br /&gt;कुछ क्षण में ही उसके सम्मुख आकृति थी,&lt;br /&gt;जैसे कि देह धर आई स्वयं प्रकृति थी।&lt;br /&gt;तन की द्युति, जैसे फेनिल चन्द्र-छटा हो,&lt;br /&gt;अलकावलि, जैसे श्यामल सजग घटा हो।&lt;br /&gt;आँखें, जैसे दो झीलें भरी-भरी हों,&lt;br /&gt;पुतलियाँ, कि जल में तिरती हुई तरी हों।&lt;br /&gt;पलकें जैसे सीपियाँ मोतियों वाली,&lt;br /&gt;करतीं बरौनियाँ निज धन की रखवाली।&lt;br /&gt;भृकुटी, जैसे दो इन्द्र-धनुष उग आए,&lt;br /&gt;चितवन, जैसे मन्थन ने तीर चलाए।&lt;br /&gt;उर, जैसे लहराता तूफानी सागर,&lt;br /&gt;करता हो जैसे अपना ओज उजागर।&lt;br /&gt;वह यौवन, जैसे लेता हो अँगड़ाई,&lt;br /&gt;साँसों में जैसे केशर-गंध समाई।&lt;br /&gt;गति, जैसे गर्वीली नागिन लहराए,&lt;br /&gt;जिस ओर चले, भारी उत्पात मचाए।&lt;br /&gt;उत्पात उपस्थित योगी के सम्मुख था,&lt;br /&gt;जैसे कि समन्वित हो आया सुख-दुख था।&lt;br /&gt;दोनों अवाक्, दोनों हतप्रभ सम्मोहित,&lt;br /&gt;जैसे प्रभाव हो पारस्परिक प्ररोहित।&lt;br /&gt;युग जैसे भारी लगे उन्हें कुछ क्षण थे,&lt;br /&gt;दोनों अंतर ही बोझिल भाव-प्रवण थे।&lt;br /&gt;प्रकृतिस्थ भावनाएँ अब मौन मुखर था,&lt;br /&gt;अब हुआ निनादित वीणा से मृदु स्वर था।&lt;br /&gt;``कल्याण-कामना हेतु दवि! प्रस्तुत हूँ,&lt;br /&gt;केवल साधक, मैं सिद्ध नहीं विश्रुत हूँ।&lt;br /&gt;अभ्यास योग का है मेरा साधारण,&lt;br /&gt;क्या पूछूँ मैं इस अमित कृपा का कारण?''&lt;br /&gt;``मेरी पीड़ा का पूछ रहे हो कारण,&lt;br /&gt;कारण भी तुम ही, उसके तुम्हीं निवारण।&lt;br /&gt;सब जान-बूझ अनजान बन रहे योगी,&lt;br /&gt;क्यों नहीं मुझे वरदान बन रहे योगी?&lt;br /&gt;यह योग सधना किसके हित अपनाई?&lt;br /&gt;चढ़ते यौवन में यह विरक्ति क्यों आई?&lt;br /&gt;क्या साध किसी की रह जाएगी प्यासी?&lt;br /&gt;यह रम्य रूप, मन में क्यों घनी उदासी?''&lt;br /&gt;``वरदान बनूँगा कैसे मैं कल्याणी,&lt;br /&gt;गृह-हीन पथिक, बिल्कुल नगण्य-सा प्राणी।&lt;br /&gt;यह प्यास, प्यास है नहीं, मात्र विकृति है,&lt;br /&gt;है तृप्ति एक इसकी, वह भाव-सुकृति है।&lt;br /&gt;मैं स्वयं रूप का भक्त, रूप वह मन का,&lt;br /&gt;सौन्दर्य नहीं होता है केवल तन का।&lt;br /&gt;तुम जिसे रूप कहती हो, वह तो छल है,&lt;br /&gt;वह रूप, आत्मा का ही केवल बल है।''&lt;br /&gt;मैं मन देती योगी! तुम मुझको बल दो,&lt;br /&gt;हम बनें मनोबल, जीवन को संबल दो।&lt;br /&gt;दो तन होकर, हम एक रूप हो जाएँ,&lt;br /&gt;जिस लिए मिला जीवन, उसका फल पाएँ।&lt;br /&gt;``तुम पुरुष, औरर मैं प्रकृति-स्वरूपा नारी,&lt;br /&gt;हम दोनों ही सह-जीवन के अधिकारी।&lt;br /&gt;मनु के आगे श्रद्धा हो रही समर्पित,&lt;br /&gt;हम करें आज नव-जीवन, नव-रस अर्जित।&lt;br /&gt;तुम शक्ति स्वरूपा, फिर क्यों सह दुर्बलता,&lt;br /&gt;क्या शोभित नारी को इतनी चंचलता?&lt;br /&gt;कुल-शील आदि कुछ ज्ञात नहीं है मेरा,&lt;br /&gt;क्यों व्यक्त अपरिचित के प्रति स्नेह घनेरा?&lt;br /&gt;``है प्रणय नहीं दुर्बलता, शाश्वत बल है,&lt;br /&gt;यह मानव जीवन का पावन शतदल है।&lt;br /&gt;अनुबंध प्रणय का कोई पाप नहीं हैं,&lt;br /&gt;वरदान प्रणय है, वह अभिशाप नहीं है।&lt;br /&gt;कुल-शील नहीं निर्णायक कभी प्रणय के,&lt;br /&gt;कुल-शील नहीं बन्धन हैं कभी हृदय के।&lt;br /&gt;पल एक बहुत है, दो अन्तर मिल जाने,&lt;br /&gt;रवि-रश्मि एक है बहुत कमल खिल जाने।&lt;br /&gt;तुम मेरे हो, जब से तुमको देखा है,&lt;br /&gt;व्यवधान नहीं अब विधि-निषेध रेखा है।&lt;br /&gt;पल भर में ही तुमको पहचान लिया है,&lt;br /&gt;मैंने तुमको बस अपना मान लिया है।''&lt;br /&gt;``अनुबन्ध देवि! दो हृदयों में होता है,&lt;br /&gt;उर एक, प्रणय का भार नहीं ढोता है।&lt;br /&gt;दो हाथों से बजती सदैव है ताली,&lt;br /&gt;मेरा अन्तर इस प्रणय-भाव से खाली।''&lt;br /&gt;मैं हूँ निवेदिता, हृदय दे रही तुमको,&lt;br /&gt;मीठे सपनों का निलय दे रही तुमको।&lt;br /&gt;योगी, यह सब स्वीकार किया जाता है,&lt;br /&gt;इन भावों का सत्कार किया जाता है।&lt;br /&gt;जो ठुकराता है प्यार, बहुत पछताता,&lt;br /&gt;लगता है उसको शाप, बहुत दुख पाता।&lt;br /&gt;अष्शिप्त बनो मत, जीवन का सुख पाओ,&lt;br /&gt;वरदान स्वयं घर आया है, अपनाओ।''&lt;br /&gt;``हूँ विवश देवि! मैं तिल भर नहीं हिलूँगा,&lt;br /&gt;इस जीवन में तो तुमको नहीं मिलूँगा।&lt;br /&gt;मेरे जीवन में नारी केवल माँ है,&lt;br /&gt;वह ज्योतित पूनम है, वह नहीं अमा है।&lt;br /&gt;तपते जीवन को, माँ शीतल छाया हैं,&lt;br /&gt;माँ से महानता ने भी बल पाया है।&lt;br /&gt;आना है तो अगले जीवन में आना,&lt;br /&gt;माँ बन कर मुझको अपने गले लगाना।''&lt;br /&gt;``योगी! सचमुच तुम जीत गए मैं हारी,&lt;br /&gt;तुम पुरुष नहीं हो हो कोई अवतारी।&lt;br /&gt;अनुभूति आज की अमर प्रेरणा होगी,&lt;br /&gt;हों माया के अपराध क्षमा, हे योगी।&lt;br /&gt;तुम हो जिसने नारी को विवश किया है,&lt;br /&gt;जीवन बिल्कुल ही मुझको नया दिया है।&lt;br /&gt;जो व्रत-साधा तुमने, पूरा वह व्रत हो,&lt;br /&gt;उस दिव्य-साधना से जन-जन उपकृत हो।''&lt;br /&gt;-०००-&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12232924-112981484318934027?l=aazadsaral.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aazadsaral.blogspot.com/feeds/112981484318934027/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=12232924&amp;postID=112981484318934027' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/112981484318934027'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/112981484318934027'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aazadsaral.blogspot.com/2005/10/12-13-14.html' title='आजाद महाकाव्य-   12,  13,  14'/><author><name>डॉ॰ व्योम</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10667912738409199754</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='07918652778961711634'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-12232924.post-112980903506190227</id><published>2005-10-20T04:44:00.000-07:00</published><updated>2006-06-23T05:48:11.576-07:00</updated><title type='text'>चन्द्रशेखर आजाद महाकाव्य</title><content type='html'>चन्द्रशेखर आजाद महाकाव्य&lt;br /&gt;-श्रीकृष्ण सरल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्ग- &lt;a href="http://aazadsaral.blogspot.com/2006/06/blog-post.html"&gt;03&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सर्ग- &lt;a href="http://aazadsaral.blogspot.com/2005/10/blog-post_20.html"&gt;09, 10, 11 &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्ग- 12, 13, 14&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्ग- 15, 16, 17&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्ग- 18, 19, 20&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्ग- 21, 22, 23&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्ग- 24, 25, 26&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12232924-112980903506190227?l=aazadsaral.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aazadsaral.blogspot.com/feeds/112980903506190227/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=12232924&amp;postID=112980903506190227' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/112980903506190227'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/112980903506190227'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aazadsaral.blogspot.com/2005/10/blog-post.html' title='चन्द्रशेखर आजाद महाकाव्य'/><author><name>डॉ॰ व्योम</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10667912738409199754</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='07918652778961711634'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-12232924.post-112980703752042326</id><published>2005-10-20T04:14:00.000-07:00</published><updated>2005-10-20T05:03:58.876-07:00</updated><title type='text'>आजाद महाकाव्य- 09, 10, 11</title><content type='html'>महाकाव्य&lt;br /&gt;चन्द्रशेखर आजाद&lt;br /&gt;-रचनाकार&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण सरल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[9]&lt;br /&gt;लखनऊ&lt;br /&gt;खुली बगावत&lt;br /&gt;लखनऊ नाम, क्या आप कहेंगे नगर मुझे?&lt;br /&gt;जी नहीं, कृपा करके मुझको नगरी कहिए।&lt;br /&gt;मन ऊब गया हो अगर आपका जीवन से,&lt;br /&gt;तशरीफ लाइए, आप यहाँ आकर रहिए।&lt;br /&gt;देखेंगे मेरा रूप, `वाह!' कह बैठेंगे&lt;br /&gt;संभव है चोरी-छिपे आह भी भर लेंगे।&lt;br /&gt;सपने, जो छलते रहे आपको अब तक हैं,&lt;br /&gt;वे अपने सपने आप यहाँ सच कर लेंगे।&lt;br /&gt;इस कदर घूर कर आप देखते क्यों मुझको,&lt;br /&gt;छलछला उठी क्यों प्यास हृदय की आँखों में?&lt;br /&gt;परिचय पाने को उत्सुक हों, तो सुनिएगा,&lt;br /&gt;मैं ऐसी वैसी नहीं, एक हूँ लाखों में।&lt;br /&gt;मैं किसी मेंढ़ पर खिला जंगली फूल नहीं,&lt;br /&gt;मैं स्निग्ध सुमन की कोमल मृदुल पाँखुरी हूँ।&lt;br /&gt;मैं नहीं सिपाही जैसा खड़ा तानपूरा,&lt;br /&gt;ज;तद्ध अधर-शयन करती, मैं वही बाँसुरी हूँ।&lt;br /&gt;मैं रूप-रंग की नहीं चटख भर ही केवल,&lt;br /&gt;मैं सिक्त-सुरभि सी, जो मन को हुलसाती है।&lt;br /&gt;मैं दूध-नहाई हुई चाँदनी की फिसलन,&lt;br /&gt;वह धूप नहीं मैं, जो तन को झुलसाती है।&lt;br /&gt;मैं नहीं किसी के फूहड़ अट्टहास जैसी,&lt;br /&gt;मैं लजवन्ती मुस्कानों की मृदु सिहरन हूँ।&lt;br /&gt;मैं किसी रूप के प्यासे की हूँ नजर नहीं,&lt;br /&gt;अध-खुले नयन की बाँकी-तिरछी चितवन हूँ।&lt;br /&gt;अरमान भीड़ बनकर बौराए-से फिरते,&lt;br /&gt;अव्यक्त खुमारी-सी मन पर छा जाती है।&lt;br /&gt;सुरमई किनारी की सिन्दूरी साड़ी में,&lt;br /&gt;जब नेह-निमन्त्रण-सी संध्या आ जाती है।&lt;br /&gt;हैं नाज और नखरे मेरे आभूषण, पर,&lt;br /&gt;मशहूर नहीं केवल लखनवी नजाकत है।&lt;br /&gt;जब कभी जुल्म की छाया मुझ पर पड़ती है,&lt;br /&gt;हर चितवन ही वन जाती खुली बगावत है।&lt;br /&gt;लावा बन जाता खून खौलता हुआ, और,&lt;br /&gt;विस्फोट अनय की लघु आहट बन जाती है।&lt;br /&gt;हर शोख अदा करती विद्रोह भयानक है,&lt;br /&gt;हर भाव आग, हर साँस लपट बन जाती है।&lt;br /&gt;यदि सुनी आपने हो चर्चा सत्तावन की,&lt;br /&gt;यदि पृष्ठ पलट कर देखें हों इतिहासों के।&lt;br /&gt;मेरे विद्रोही पैरों ने मुँह कुचले थे&lt;br /&gt;नापाक इरादे लिए खून के प्यासों के।&lt;br /&gt;तब थिरक उठे थे पाँव, जवानी नाची थी,&lt;br /&gt;लहलह करते जलते भीषण अंगारों पर।&lt;br /&gt;धड़ से फिरंगियों के सर उछल-उछल पड़ते,&lt;br /&gt;जब हाथ जवानों के पड़ते तलवारों पर।&lt;br /&gt;आँखों में उतरे हुए खून की सुर्खी ले,&lt;br /&gt;रण-खेतों में जब मेरे शेर उतरते थे।&lt;br /&gt;अंग्रेज लड़ाके बख्शो! बख्शो! चिल्लाते,&lt;br /&gt;नापाक इरादे तौबा ! तौबा! करते थे।&lt;br /&gt;मैं वही लखनऊ, मुझमें वही खून अब भी,&lt;br /&gt;बरजोर खून में अब भी वही रवानी है।&lt;br /&gt;हर बूँद खून की, है पागल तूफान लिए,&lt;br /&gt;हर बूँद, जोश की जलती हुई निशानी है।&lt;br /&gt;हाँ, एक बात रह गई और वह भी कह दूँ,&lt;br /&gt;अंग्रेज हुकूमत ने फिर मुँह की खाई थी।&lt;br /&gt;अपने आँचल से मैंने तेज हवा की थी,&lt;br /&gt;जब आग क्रान्तिकारी दल ने भड़काई थी।&lt;br /&gt;वे मुट्ठी भर, लेकिन पहाड़ से टकराए,&lt;br /&gt;साम्राज्यवाद की कैसी शान उछाली थी।&lt;br /&gt;दुनिया के आगे बड़ी नाक वाले बनते,&lt;br /&gt;उस बड़ी नाक में उनने कौड़ी डाली थी।&lt;br /&gt;काकोरी कहता, क्रांतिकारियों ने उनकी,&lt;br /&gt;गाड़ी तो क्या, सचमुच इज्जत ही लूटी थी।&lt;br /&gt;जब रास खींच कर उसे रोक ली, तो उनकी&lt;br /&gt;छूटती कहाँ से गाड़ी, नाड़ी छूटी थी।&lt;br /&gt;वह लुटी-पिटी गाड़ी आई रोती-रोती,&lt;br /&gt;वे क्रांति-वीर आए इठलाते मदमाते।&lt;br /&gt;अपनी आँखों से मैंने दोनों को देखा,&lt;br /&gt;वे दिन रह-रह कर अब भी मुझे याद आते।&lt;br /&gt;बिस्मिल, उफ कैसा विकट हौसला था उसमें,&lt;br /&gt;वह जान झोंक देने में औरों से बढ़कर।&lt;br /&gt;अशफाक चाँद-सूरज का एक नमूना था,&lt;br /&gt;वह चमक उठा, शासन की छाती पर चढ़कर।&lt;br /&gt;रोशन, बहादुरी को रोशन करने आया,&lt;br /&gt;वह अक्खड़ता है अब न देखने को मिलती।&lt;br /&gt;राजेन्द्र गजब की अलमस्ती उसने पाई,&lt;br /&gt;जो उसे देखता, मन की कली-कली खिलती।&lt;br /&gt;आजाद, नहीं मिलती उसकी कोई मिसाल,&lt;br /&gt;क्या विकट दिलेरी और बला की तेजी थी।&lt;br /&gt;कुछ खास तौर से अपने हाथों से गढ़कर,&lt;br /&gt;वह हस्ती मालिक ने दुनिया में भेजी थी।&lt;br /&gt;वह झूम-झूम कर चलना, उसका इठलाना,&lt;br /&gt;वह जोखिम में उसका आगे-आगे रहना।&lt;br /&gt;वह शान, बहुत मुश्किल करना उसका बयान,&lt;br /&gt;वह वतन-परस्ती उसकी, उसका क्या कहना।&lt;br /&gt;अफसोस! जाल में उलझ गए उनमें से कुछ,&lt;br /&gt;फिर हुआ न्याय का नाटक, जैसे होता है।&lt;br /&gt;वे झूल गए फन्दों पर हँसते-हँसते ही,&lt;br /&gt;दिल करके उनकी याद आज भी रोता है।&lt;br /&gt;आजाद, नाम जैसा खुद भी आजाद रहा,&lt;br /&gt;अंग्रेज हुकूमत छू न सकी उसकी छाया।&lt;br /&gt;वह आँख-मिचौनी रहा खेलता उससे ही,&lt;br /&gt;था नोच रहा खंभा, वह शासन खिसियाया।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[10]&lt;br /&gt;विकट हौसला&lt;br /&gt;ले रहे आप रुचि हैं मेरी इन बातों में&lt;br /&gt;इसलिए कर रहा दिल, कुछ और सुनाऊँ मैं।&lt;br /&gt;आजाद किस तरह लुकाछिपी खेला करता,&lt;br /&gt;कुछ और करिश्में देखे हुए, दिखाऊँ मैं।&lt;br /&gt;आ सकी न कोई उसके दिल में दुर्बलता,&lt;br /&gt;आती कैसे, वह शक्ल देख घबराती थी।&lt;br /&gt;धीरता डालती थी उस पर अपने डोरे,&lt;br /&gt;वीरता निछावर उस पर हो-हो जाती थी।&lt;br /&gt;शासन की आँखों में वह धूल झोंकता था,&lt;br /&gt;पानी में रहकर बैर मगर से करता था।&lt;br /&gt;जब कमजोरी उसके दिल में थी आ न सकी,&lt;br /&gt;डर भी उसके दिल में आने से डरता था।&lt;br /&gt;स्वछन्द पवन जैसी-उसकी इच्छाएँ थीं,&lt;br /&gt;अरमान अग्नि-मुख-पर्वत जैसे बलशाली।&lt;br /&gt;उसकी गतिविधियाँ होनहार की गति जैसी,&lt;br /&gt;आजाद शत्रु के लिए बना करता बाली।&lt;br /&gt;उस दिन उसके मन में यह इच्छा तड़प उठी,&lt;br /&gt;अशफाक जेल में है, उससे मिल आऊँ मैं।&lt;br /&gt;दो बातें करना सचमुच अगर पाप है तो,&lt;br /&gt;दर्शन करके ही जी की जलन मिटाऊँ मैं।&lt;br /&gt;इच्छा का अंकुर उगा, पात फूटे-फैले,&lt;br /&gt;जीवन लहराया, फूलों ने थे फल पाए।&lt;br /&gt;जेलर साहब ने सुना, वहाँ उनसे मिलने,&lt;br /&gt;कोई अच्छे-खासे तगड़े लाला आए।&lt;br /&gt;बंदगी हुजूरे आली! मैं साहू चन्दर,&lt;br /&gt;हाजिर हूँ अपने वतन बड़ौदा, से आकर।&lt;br /&gt;सोचा, हुजूर की खिदमत में कुछ अर्ज करूँ,&lt;br /&gt;मैं देखूँ अपना भाग्य यहाँ भी अजमा कर।&lt;br /&gt;मैं मूँगफली का बहुत बड़ा व्यापरी था,&lt;br /&gt;पिट गया सभी व्यापार, दिवाला निकल गया।&lt;br /&gt;सोचा, दुर्दिन में घर से दूर रहूँ, चलकर,&lt;br /&gt;रोजी-रोटी के लिए करूँ कुछ काम नया।&lt;br /&gt;सुनते हैं, रसद कैदियों को जो दी जाती,&lt;br /&gt;यह काम दिया जाता है ठेकेदारों को।&lt;br /&gt;इस साल इनायत हो मुझ पर गरीब परवर।&lt;br /&gt;मिल जाये रोटी हम जैसे बेचारों को।&lt;br /&gt;जो सिफ्त काम में मेरे, वह भी बतला दूँ,&lt;br /&gt;वह रसद, जे के कैदी यद्यपि खाएँगे।&lt;br /&gt;पर असर पडेग़ा रसद बाँटने वालों पर,&lt;br /&gt;वे मुझ जैसे मोटे-तगडे हो जाएँगे।''&lt;br /&gt;``लालाजी! यह दिल्लगी नहीं, गर सच है तो,&lt;br /&gt;हम कोशिश करके काम तुम्हें दिलवाएँगे।&lt;br /&gt;पर खौफ हमें, यदि अनशन कर बैठ कैदी,&lt;br /&gt;तो क्या उन जैसे पिचक नहीं हम जाएँगे।''&lt;br /&gt;लाला बोले, ``मैं शक्ल देख कर कह सकता,&lt;br /&gt;खाएगा गुपचुप कौन, कौन चिल्लाएगा।&lt;br /&gt;जब अनशन करने की नौबत आएगी, तो,&lt;br /&gt;उसका इलाज भी उस जैसा हो जाएगा।``&lt;br /&gt;जेलर साहब ने साथ लिया लालाजी को,&lt;br /&gt;ले चले दिखाने कैदी और कैदखाना।&lt;br /&gt;वे सोच रहे थे यह बकरा फँस जाए, तो&lt;br /&gt;पक जाएगा अपना भी अच्छा नजराना।&lt;br /&gt;क्या पता, जिसे वे बकरा समझ रहे थे, वह&lt;br /&gt;नाखून छिपाए, बबर शेर का चाचा था।&lt;br /&gt;शासन के मुँह का घाव अभी भी भरा न था,&lt;br /&gt;जब काकोरी में उसने जड़ा तमाचा था।&lt;br /&gt;आतुर जिसके हित बन्दी-गृह की दीवारें,&lt;br /&gt;शासन की सुरसा भूखी जिसे लील जाने।&lt;br /&gt;वह खड़ा उन्हीं के बीच प्राण-जैसा तन में,&lt;br /&gt;उन्नत ग्रीवा, नि:शंक, निडर, सीना ताने।&lt;br /&gt;अशफाक देखकर उसको, क्षणभर को चौंका,&lt;br /&gt;पण्डितजी कैसे यहाँ, कलेजा काँप गया।&lt;br /&gt;पर समझ गये, हौसला इन्हें ले आया है,&lt;br /&gt;क्या उनके दिल में है, वह यह भी भाँप गया।&lt;br /&gt;जो कुछ आँखों ने कहा, सुना वह आँखों ने,&lt;br /&gt;मुख और कान, दोनों अवयव बेकार हुए।&lt;br /&gt;रीझे-खीझे, उलझे-सुलझे, भर-भर आए,&lt;br /&gt;दिल एक-दूसरे पर इस तरह निसार हुए।&lt;br /&gt;पिंजड़ा मलता रह गया हाथ, उसका शिकार&lt;br /&gt;वह चला गया बाहर, उसके भीतर आकर।&lt;br /&gt;जेलर समझा, उँगली से पहुँचा पकडेंग़े,&lt;br /&gt;पर लाला खिसका, साफ अँगूठा दिखलाकर।&lt;br /&gt;-०००-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[11]&lt;br /&gt;झाँसी&lt;br /&gt;मौत की माँग&lt;br /&gt;मैं झाँसी, दुश्मन के मंसूबों की फाँसी,&lt;br /&gt;मैं ज्योति वीरता के ज्वलन्त आदशों की।&lt;br /&gt;स्वातंत्र्य हेतु तलवार सान पर चढ़ी हुई,&lt;br /&gt;जीवंत प्रेरणा मैं भीषण संघर्षों की।&lt;br /&gt;मेरी मिट्टी में बारूदी विस्फोट सजग,&lt;br /&gt;हर कंकड़ है मेरा, बलिदान-कहानी है।&lt;br /&gt;हर पत्थर है बेजोड़ वीरता का स्मारक,&lt;br /&gt;मैं वह, जिसमें पर्याय आग, का पानी है।&lt;br /&gt;मैं वह, जिसकी बरजोर हवाओं में बिजली,&lt;br /&gt;जिसकी हर पत्ती के हैं तेवर तने हुए।&lt;br /&gt;जिससे टकरा कर मौत स्वयं मुँह की खाए,&lt;br /&gt;मेरे बेटे हैं उसी धातु के बने हुए।&lt;br /&gt;तलवार हाथ में लिए बुन्देला टूट पड़े,&lt;br /&gt;दुश्मन पर्वत भी हो तो वह हट जाएगा।&lt;br /&gt;वह टूट जायगा किन्तु झुकेगा नहीं कभी,&lt;br /&gt;धरती के हित वह खड़ा-खड़ा कट जाएगा।&lt;br /&gt;यदि नाम पूछना हो मेरा, तो सुनो पथिक!&lt;br /&gt;लन्दन वालों से पूछो, वे बतलाएँगें।&lt;br /&gt;झाँसी कहने के पहले थर-थर काँपेंगे,&lt;br /&gt;लेते ही मेरा नाम, घाव हरियायेंगे।&lt;br /&gt;जब डींग मारते हों वे कभी वीरता की,&lt;br /&gt;ले दो झाँसी का नाम, मुर्दनी छाएगी।&lt;br /&gt;वे भले भूल जाएँ अपने राजा-रानी,&lt;br /&gt;झाँसी की रानी नहीं भुलाई जाएगी।&lt;br /&gt;मैं झाँसी, मेरा नाम स्वयं इतिहास एक,&lt;br /&gt;अक्षर-अक्षर बलिदान कहानी कहता है।&lt;br /&gt;जब कभी देश का मान दाँव पर लगता है,&lt;br /&gt;मेरा विद्रोही खून नहीं चुप रहता है।&lt;br /&gt;मेरी मिट्टी के आगे सोना मिट्टी है,&lt;br /&gt;मेरी मिट्टी, हर देश-भक्त को चन्दन है।&lt;br /&gt;हर कण सजीवता की जीवित परिभाषा है,&lt;br /&gt;हर क्षण जीवन का सर्वोपरि अभिनंदन है।&lt;br /&gt;जिनके अंतर में देश-भक्ति की अमर ज्योति&lt;br /&gt;वे दीवाने, मेरे दर्शन को आते हैं।&lt;br /&gt;उनकी भावुकता मेरे लिए समस्या है,&lt;br /&gt;मेरी मिट्टी, वे अपने शीष चढ़ाते हैं।&lt;br /&gt;आया था ऐसा ही दीवाना एक कभी,&lt;br /&gt;शायद उसने कुछ आक-धतूरा खाया था।&lt;br /&gt;सब लोग माँगते सुखी, दीर्घ अच्छा जीवन,&lt;br /&gt;वह मुझसे अच्छी मौत माँगने आया था।&lt;br /&gt;बोला, माँ! दे सकती हो तो यह वर दे-दे,&lt;br /&gt;आजादी के तेरे सपने साकार करूँ।&lt;br /&gt;आलेख प्रेरणा की जो रहे पीढ़ियों को,&lt;br /&gt;जो मरदों को जीवन दे, ऐसी मौत मरूँ।&lt;br /&gt;रह गई स्तब्ध, जब मैंने उसकी माँग सुनी,&lt;br /&gt;`हाँ या ना' इनमें से कुछ भी कैसे कहती।&lt;br /&gt;जिसने मुझको माँ कह, मेरी पद-रज ली थी।&lt;br /&gt;माँ बनकर उसकी मौत भला कैसे सहती।&lt;br /&gt;`ना' भी इसलिए नहीं मेरे मुँह से निकला,&lt;br /&gt;युग-ध्वनि उसकी वाणी में मुझे सुनाई दी।&lt;br /&gt;आजादी की तस्वीर गढ़ी थी जो मैंने,&lt;br /&gt;उसके संकल्पों में मुझको दिखलाई दी।&lt;br /&gt;मैं इतना ही कह सकी यशस्वी रहो वत्स!&lt;br /&gt;तेरा जीवन, मेरे सपनों की गोद पले।&lt;br /&gt;क्या कहूँ मौत की मौत नहीं, वह जीवन हो,&lt;br /&gt;तेरे इच्छा-पथ पर वह सहमी हुई चले।&lt;br /&gt;-०००-&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12232924-112980703752042326?l=aazadsaral.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aazadsaral.blogspot.com/feeds/112980703752042326/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=12232924&amp;postID=112980703752042326' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/12232924/posts/default/112980703752042326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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